सर्दियों में मन सुस्त और उदास क्यों हो जाता है- कभी सोचा ?

सर्दियाँ आते ही बहुत-से लोग बिना किसी बड़ी वजह के खुद में बदलाव महसूस करने लगते हैं। सुबह उठने का मन नहीं करता, काम में मन नहीं लगता, छोटी-छोटी बातों पर चिड़चिड़ापन बढ़ जाता है, और कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे अंदर कुछ “भारी-सा” हो गया हो।
अक्सर लोग इसे कह देते हैं- “मौसम का असर है” या “ठंड में तो ऐसा होता ही है।”लेकिन सवाल यह है कि आख़िर क्यों? क्या यह सिर्फ ठंड है, या इसके पीछे दिमाग और शरीर के भीतर चलने वाली कोई गहरी प्रक्रिया है?
यह समस्या सिर्फ भावनात्मक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कारणों से जुड़ी है। इसे ‘विंटर ब्लूज़’ या ‘सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD)’ कहा जाता है। इस आर्टिकल में हम गहराई से समझेंगे- सर्दियों में उदासी के कारण, इसके प्रभाव और आसान उपाय। अगर आप भी इस सुस्ती से जूझ रहे हैं, तो अंत तक पढ़ें – राहत मिलेगी !
सर्दियों में उदासी: एक वैज्ञानिक नजरिया
हम अक्सर सोचते हैं कि मौसम सिर्फ शरीर को प्रभावित करता है- ठंड लगी, सर्दी-खाँसी हुई, जोड़ों में दर्द हुआ। लेकिन सच यह है कि मौसम का सबसे गहरा असर हमारे दिमाग पर पड़ता है। दिमाग एक जैविक मशीन है जो रोशनी, तापमान, दिन-रात की लंबाई, सामाजिक गतिविधियों- इन सब संकेतों से तय करता है कि उसे कितनी ऊर्जा खर्च करनी है और कितनी बचानी है।
सर्दियों में ये सारे संकेत बदल जाते हैं और दिमाग अपने आप “स्लो मोड” में चला जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया भर में 10% लोग सर्दियों में डिप्रेशन के शिकार होते हैं। भारत जैसे देशों में, जहां सूरज की रोशनी कम हो जाती है, यह समस्या और गंभीर हो जाती है।
धूप की कमी: उदासी की सबसे बड़ी जड़
सर्दी में मन उदास क्यों होता है? इसका जवाब ब्रेन केमिस्ट्री और पर्यावरण में छिपा है। इसका मुख्य कारण है सूर्य की कमी। सर्दियों में सबसे बड़ा बदलाव होता है- धूप की कमी। दिन छोटे हो जाते हैं, सुबह देर से उजाला होता है, शाम जल्दी अंधेरा छा जाता है। धूप सिर्फ गर्मी नहीं देती, वह दिमाग के लिए सिग्नल होती है।
जब धूप हमारी आँखों के ज़रिये दिमाग तक पहुँचती है, तो दिमाग में कुछ ज़रूरी रसायन संतुलित रहते हैं- मूड ठीक रहता है, ऊर्जा बनी रहती है, मन स्थिर रहता है। सर्दियों में जब धूप कम मिलती है, तो दिमाग को गलत संकेत मिलने लगते हैं कि शायद अब आराम करने, पीछे हटने और ऊर्जा बचाने का समय है। यहीं से मन की सुस्ती शुरू होती है।
गर्मियों में हम रोज 12-14 घंटे धूप लेते हैं, लेकिन सर्दियों में यह घटकर 8-10 घंटे रह जाता है। सूरज की किरणें त्वचा में विटामिन D बनाती हैं, जो हार्मोन्स को नियंत्रित करता है।
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जैविक कारण: हार्मोनल असंतुलन
भारतीय संदर्भ में, उत्तर भारत (दिल्ली, पंजाब) में कोहरा सूरज को 70% ब्लॉक कर देता है। एक ICMR स्टडी (2024) बताती है कि 25% युवा सर्दियों में डिप्रेशन महसूस करते हैं।
1. सेरोटोनिन: खुशी का रसायन घटने लगता है
हमारे मूड का एक बड़ा हिस्सा सेरोटोनिन नामक रसायन पर निर्भर करता है। यह हमें स्थिरता, संतोष, भावनात्मक संतुलन देता है।सेरोटोनिन का स्तर धूप से सीधे जुड़ा हुआ होता है। सूरज की UVB किरणें सेरोटोनिन बढ़ाती हैं। सर्दियों में जब धूप कम होती है तो सेरोटोनिन का उत्पादन कम होने लगता है जिससे मन भारी होता है और नकारात्मक सोच तेज हो जाती है।
इसका मतलब यह नहीं कि आप “कमज़ोर” हैं। इसका मतलब है कि आपका दिमाग जैविक रूप से अलग ढंग से काम कर रहा है। एक अध्ययन (Harvard Medical School, 2023) के अनुसार, 60% लोग विटामिन D की कमी से प्रभावित होते हैं।
2. मेलाटोनिन बढ़ जाता है: नींद और सुस्ती छा जाती है
मेलाटोनिन वह हार्मोन है जो हमें नींद के लिए तैयार करता है। अंधेरा बढ़ने से पाइनियल ग्लैंड मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) ज्यादा बनाता है। जिससे दिन में भी नींद जैसा महसूस होता है। सर्दियों में अंधेरा जल्दी होने से मेलाटोनिन ज़्यादा बनता है जिससे नींद की तलब ज़्यादा लगती है और सुबह जागने में भी परेशानी होती है।
जब मेलाटोनिन ज़्यादा रहता है, तो दिमाग “एक्टिव मोड” में नहीं आ पाता। इसीलिए सर्दियों में लोग कहते हैं “पूरी नींद लेने के बाद भी थकान लगती है।” यह आलस नहीं, हॉर्मोनल बदलाव है।
3. डोपामाइन का गिरना: व्यायाम की कमी
डोपामाइन मस्तिष्क का “प्रेरणा हार्मोन” है, जो इनाम और सुख की भावना पैदा करता है। जो मोटिवेशन, फोकस और एनर्जी नियंत्रित करता है। सामान्य स्तर पर यह “सुबह उठो, काम करो” वाली ड्राइव देता है। सर्दी में पार्क जाना या जॉगिंग मुश्किल लगती है। व्यायाम डोपामाइन रिसेप्टर्स को सक्रिय करता है।
कम धूप से मस्तिष्क का क्लॉक प्रभावित, डोपामाइन पीक टाइम शिफ्ट हो जाता है। ठण्ड से कोर्टिसोल बढ़ता है, जो डोपामाइन को ब्लॉक करता है। परिणाम: सुस्ती, प्रोक्रास्टिनेशन। हर वर्कआउट सेशन डोपामाइन को 200% बूस्ट करता है (Harvard Study), लेकिन सर्दी में यह 50% गिर जाता है। नतीजा? बेड से उठना भारी, काम में मन न लगना।
सर्दियों में सुस्ती के मनोवैज्ञानिक कारण
जैसा कि हम पहले कह चुके हैं- इस मौसम में केवल हमारा शरीर ही नहीं, मन भी प्रभावित होता है। सर्दी में सुस्ती को समझने के लिए मनोविज्ञान को समझना जरूरी है।
सीजनल अफेक्टिव डिसऑर्डर (SAD) क्या है?
SAD एक प्रकार का डिप्रेशन है जो मौसमी बदलाव से होता है। DSM-5 (अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन) इसे मान्यता देता है। इसके लक्षण: 1. लगातार उदासी और निराशा। 2. ऊर्जा की कमी, सुस्ती। 3. भूख बढ़ना या कम होना (वजन बढ़ना आम)। 4. नींद ज्यादा आना। 5. एकाग्रता में कमी। महिलाओं में यह डिसऑर्डर 80% ज्यादा होता है, क्योंकि एस्ट्रोजन हार्मोन प्रभावित होता है। उत्तराखंड, हिमाचल जैसे पहाड़ी इलाकों में SAD 30% ज्यादा होता है।
संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह (Cognitive Biases)
सर्दियों में ‘नेगेटिव बायस’ बढ़ता है। हम नकारात्मक विचारों पर ज्यादा फोकस करते हैं। उदाहरण: “यह सर्दी कभी खत्म नहीं होगी।” इस मौसम में कुछ नहीं किया जा सकता”। यह हमारी सोचने और निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करता है। CBT (कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी) इसे ठीक करती है। भारतीय संस्कृति में, सर्दी को ‘शीतकाल’ कहा जाता है, जो आयुर्वेद में ‘वात दोष’ बढ़ाने वाला माना जाता है। वात दोष से चिंता और सुस्ती होती है।
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सर्दियों में उदासी के शारीरिक प्रभाव
भारत में सर्दियां छोटी लेकिन तीव्र होती हैं। दिल्ली में जनवरी में तापमान 5°C तक गिरता है, कोहरा सूरज चुरा लेता है। इस दौरान मन की उदासी शरीर को भी कमजोर कर देती है। अक्सर हम सोचते हैं कि उदासी सिर्फ मन की स्थिति है।
लेकिन सच्चाई यह है कि जब मन लंबे समय तक उदास रहता है, तो उसका असर सीधे शरीर पर दिखने लगता है- खासतौर पर सर्दियों में।सर्दियों की उदासी केवल भावनात्मक नहीं होती, यह शारीरिक बदलावों की एक पूरी श्रृंखला होती है।
1. लगातार थकान और भारीपन
सर्दियों में उदासी का सबसे पहला शारीरिक संकेत है- बिना ज़्यादा काम किए भी थक जाना, सुबह उठते ही शरीर भारी लगता है, दिन भर सुस्ती बनी रहती है, आराम करने के बाद भी ऊर्जा वापस नहीं आती।
ऐसा क्यों होता है? क्योंकि उदासी में दिमाग “ऊर्जा बचाने वाले मोड” में चला जाता है, शरीर को संकेत मिलता है कि ज्यादा ऊर्जा खर्च न की जाए, मांसपेशियाँ और नर्वस सिस्टम सुस्त हो जाते हैं। यह आलस नहीं, न्यूरोलॉजिकल प्रतिक्रिया है।
2. नींद का बिगड़ जाना (ज्यादा या कम)
लंबी रातें नींद बिगाड़ती हैं। 70% लोग सर्दियों में अनिद्रा या हाइपरसोमनिया (ज्यादा नींद) से ग्रस्त होते हैं। इससे डेली रूटीन बिगड़ता है।सर्दियों की उदासी नींद को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है। इसमें दो तरह की समस्या दिखती है: बहुत ज़्यादा नींद आना या नींद आकर भी बार-बार टूटना।
नींद के बाद भी: ताज़गी महसूस नहीं होती, सिर भारी रहता है क्योंकि उदासी में नींद से जुड़े हार्मोन असंतुलित हो जाते हैं, शरीर को “आराम चाहिए” का संकेत ज़्यादा मिलने लगता है।
3. भूख और खाने की आदतों में बदलाव
सुस्ती से व्यायाम बंद हो जाता है, कार्ब्स की क्रेविंग बढ़ती है। एक स्टडी (Journal of Nutrition, 2023) कहती है, सर्दियों में औसतन लोगों का 2-5 किलो वजन बढ़ता है।
सर्दियों में उदासी के साथ अक्सर देखा जाता है- मीठा या कार्बोहाइड्रेट खाने की तीव्र इच्छा, तला-भुना, भारी खाना ज़्यादा अच्छा लगना या कुछ लोगों में भूख बिल्कुल कम हो जाना दिखता है। इसका असर शरीर पर: वजन बढ़ना, पेट भारी रहना, सुस्ती और गैस, ब्लड शुगर में उतार-चढ़ाव होता है। यह इच्छा हमारी कमज़ोरी नहीं, बल्कि दिमाग का तात्कालिक राहत खोजने का तरीका है।
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4. शरीर में दर्द, अकड़न और जकड़न
बहुत से लोग कहते हैं- “सर्दियों में शरीर टूट-सा जाता है” यह सिर्फ ठंड नहीं है। उदासी से जुड़े दर्द में – गर्दन और कंधों में जकड़न, पीठ और जोड़ों में दर्द, सिरदर्द आदि लक्षण दिखते हैं।
ऐसा इसलिए होता है क्योंकि – लंबे समय तक उदास रहने पर मांसपेशियाँ तनाव में रहती हैं, शरीर खुद को “सिकोड़” लेता है, रक्त संचार धीमा पड़ता है। मतलब, मन की सिकुड़न → शरीर की अकड़न
5. इम्युनिटी का कमज़ोर होना
ठंड से कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) बढ़ता है, जो इम्यूनिटी घटाता है। सर्दियों में फ्लू, सर्दी-खांसी 50% ज्यादा होती है (CDC डेटा, 2024)। उदास मन से हीलिंग धीमी हो जाती है। सर्दियों में उदास रहने वाले लोग अकसर- बार-बार सर्दी-जुकाम, गले में दर्द, लंबे समय तक बीमारी से उबर न पाना जैसी समस्याएँ बताते हैं।
क्योंकि उदासी और तनाव से शरीर की सुरक्षा प्रणाली दब जाती है, शरीर “लड़ने” की बजाय “बचने” की अवस्था में चला जाता है। इसलिए सर्दियों में मानसिक स्थिति का ध्यान रखना शरीर की इम्युनिटी के लिए भी बहुत ज़रूरी है।
6. पाचन तंत्र पर असर
मन और पेट का रिश्ता बहुत गहरा है। सर्दियों की उदासी में: कब्ज, अपच, पेट फूलना, भारीपन जैसी शिकायतें बढ़ जाती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उदासी में नर्वस सिस्टम धीमा हो जाता है, पाचन से जुड़ी गतिविधियाँ सुस्त पड़ जाती हैं इसीलिए कई बार दवा से ज़्यादा
मानसिक राहत पेट को ठीक करती है।
7. सांस और दिल की धड़कन पर प्रभाव
कुछ लोगों को सर्दियों की उदासी में- सीने में भारीपन, गहरी सांस न आना, दिल की धड़कन का असामान्य लगना जैसा महसूस होता है।यह दिल की बीमारी नहीं, बल्कि तनाव और भावनात्मक दबाव का शारीरिक रूप हो सकता है जो सर्दियों में बढ़ जाता है।
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8. हार्मोनल असंतुलन के संकेत
लंबे समय तक सर्दियों की उदासी बने रहने पर: महिलाओं में पीरियड्स अनियमित, पुरुषों में ऊर्जा और इच्छा में कमी, चिड़चिड़ापन बढ़ना, गुस्सा आना जैसे लक्षण दिख सकते हैं। यह दिखाता है कि उदासी केवल भावना नहीं, पूरा शरीर प्रभावित करने वाली स्थिति है।
9. सामाजिक दूरी और भावनात्मक ठंडापन
सर्दियों में लोग बाहर कम निकलते हैं, दोस्तों से मिलना घट जाता है, अकेले रहने का समय बढ़ जाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।
हमारा दिमाग कनेक्शन से ऊर्जा लेता है। जब संपर्क कम होता है, तो अकेलापन बढ़ता है, मन उदास होता है, भावनाएँ भारी लगती हैं, इसीलिए सर्दियों में कई लोगों को बिना वजह अकेलापन और खालीपन महसूस होता है।
सर्दियों में नकारात्मक सोच क्यों बढ़ जाती है
सर्दियों में जब शरीर में ऊर्जा कम होती है, तो दिमाग सकारात्मक सोच पर उसे खर्च नहीं करना चाहता। क्योंकि उसमें ज्यादा ऊर्जा खर्च होती है। नकारात्मक सोच दिमाग के लिए- आसान, कम ऊर्जा वाली और परिचित होती है। इसलिए सर्दियों में पुरानी यादें, पछतावे, डर, भविष्य की चिंता आदि सोच ज़्यादा सक्रिय हो जाती हैं।
यह सोच आपकी पहचान नहीं है, यह सिर्फ मौसम के अनुसार दिमाग की स्थिति है। समाज हमें सिखाता है कि “हमेशा एक्टिव रहो” “सुस्ती कमजोरी है” लेकिन प्रकृति कहती है कि हर मौसम का अपना रिदम होता है। सर्दियाँ रुकने, सोचने, भीतर देखने और खुद को संभालने का समय हैं। जब हम खुद को जबरदस्ती गर्मियों की तरह चलाने की कोशिश करते हैं, तो मन और ज़्यादा टूटता है।
सर्दियों में सुस्ती दूर करने के वैज्ञानिक उपाय
सुस्ती और उदासी सर्दियों में बढ़ती है लेकिन अच्छी बात है कि इसे कंट्रोल किया जा सकता है। यहां स्टेप-बाय-स्टेप गाइड प्रस्तुत है।
1. लाइट थेरेपी (Light Therapy)
लाइट थेरेपी एक तरीका है जिसमें इंसान रोज़ कुछ मिनट तेज़, सुरक्षित रोशनी के सामने बैठता है, ताकि दिमाग को ऐसा लगे जैसे उसे धूप मिल रही हो। सर्दियों में धूप कम मिलने से दिमाग के “खुशी वाले केमिकल” घट जाते हैं, जिससे मन सुस्त और उदास लगता है।
लाइट थेरेपी इस कमी को पूरा करती है, खासतौर पर SAD में मददगार मानी जाती है।
सुबह के समय, 20–30 मिनट तक 10,000 lux वाली लाइट बॉक्स के सामने रहें। सीधे लाइट को घूरना नहीं है। लाइट थेरेपी दिमाग को दिया गया एक साफ़ संकेत है-“अभी उजाला है, जागो और एक्टिव रहो।” 80% मामलों में सुधार दिखता है (APA स्टडी)। भारत में भी उपलब्ध है।
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2. विटामिन D/ सप्लीमेंट
सर्दियों में धूप कम मिलने की वजह से Vitamin D की कमी आम हो जाती है। यह सिर्फ हड्डियों नहीं, बल्कि मूड, इम्युनिटी और ऊर्जा से भी जुड़ा है। सुबह 10–12 बजे की धूप सबसे बेहतर होती है। 20–30 मिनट, हाथ, चेहरा या पैर खुले हों। कांच के पीछे बैठने से फायदा नहीं मिलता। सर्दियों में रोज़ धूप मिल पाना मुश्किल होता है, इसलिए सिर्फ धूप पर निर्भर रहना काफी नहीं।
खाने से Vitamin D कम मात्रा में मिलता है, फिर भी मदद करता है: अंडे की जर्दी, फोर्टिफाइड दूध / दही, मशरूम, फैटी फिश (अगर खाते हों) लें। अगर धूप और खाना पर्याप्त न हो, तो सप्लीमेंट उपयोगी होते हैं। आम तौर पर डॉक्टर सलाह देते हैं: Vitamin D3 (Cholecalciferol) हफ्ते में 1 बार या रोज़ low dose (व्यक्ति पर निर्भर), लेकिन बिना टेस्ट के लंबे समय तक हाई डोज न लें।
3. व्यायाम और रूटीन
सर्दियों में रोज 30 मिनट वॉक या योग जरूर करें। यदि मौसम ज्यादा खराब हो तो घर के अंदर सूर्य नमस्कार करें। इस मौसम में HIIT वर्कआउट डोपामाइन बढ़ाते हैं। (High-Intensity Interval Training)
यह एक ऐसा वर्कआउट तरीका है जिसमें बहुत तेज़ एक्सरसाइज़ और थोड़े आराम के छोटे-छोटे दौर (intervals) होते हैं। जैसे – 20–40 सेकंड तेज़ एक्सरसाइज़, फिर 10–30 सेकंड आराम, यही चक्र 10–20 मिनट तक चलता है।
इससे कम समय में ज़्यादा कैलोरी बर्न होती है। फैट तेज़ी से घटाने में मदद, दिल और फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, मेटाबॉलिज़्म लंबे समय तक एक्टिव रहता है।
4. आहार में बदलाव
जाड़ों में आहार में बदलाव करना बहुत जरुरी होता है। भारतीय सुपरफूड्स जो हमारे किचेन में मौजूद रहते हैं उनका उपयोग सही ढंग से करना चाहिए –
बादाम और अखरोट: इससे ओमेगा-3 से सेरोटोनिन बढ़ता है। हल्दी दूध: हल्दी एंटीडिप्रेसेंट है। अदरक/ सौंठ-शहद: यह वात को कम करती है। पालक, मेथी: ये विटामिन D के स्रोत हैं। इस मौसम में कम कार्ब्स और ज्यादा प्रोटीन लेना चाहिए।
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लाइफस्टाइल हैक्स: सर्दी को एंजॉय करें
- मेडिटेशन ऐप्स: प्रतिदिन मैडिटेशन करे आधा घंटा
- जर्नलिंग: डायरी में रोज 3 अच्छी बातें लिखें।
- CBT: नेगेटिव थॉट्स को चैलेंज करें। पॉजिटिव सोचें, खुश रहें।
- लोगों से मिलें, बातें करें, दोस्त बनायें। सोशल सपोर्ट जरूरी।
- सुबह पर्दे खोलें – नैचुरल लाइट आने दें।
- गर्म पानी पिएं, ठंडा अवॉइड करें।
- अच्छा संगीत सुनें – upbeat बॉलीवुड ट्रैक्स।
सर्दियाँ हमें क्या सिखाती हैं?
सर्दियाँ हमें याद दिलाती हैं कि हम मशीन नहीं हैं, इंसान हैं। हमारा मन मौसम से जुड़ा है, प्रकृति से जुड़ा है, रुकने का हक़ रखता है। अगर आप इस मौसम में थोड़े धीमे हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि आप पीछे जा रहे हैं। शायद आप अंदर से खुद को दोबारा जोड़ रहे हैं।
निष्कर्ष: सर्दी को दोस्त बनाएं
सर्दियों में मन का सुस्त और उदास होना कमज़ोरी नहीं, बल्कि दिमाग और शरीर का संकेत है- कि अब रफ्तार कम करो, खुद को सुनो और अपने भीतर गर्माहट पैदा करो। जब हम इस संकेत को समझ लेते हैं, तो सर्दियाँ बोझ नहीं, self-reset का मौसम बन जाती हैं।
ये पता है कि सर्दियों में ये मूड सामान्य है, लेकिन इसे इग्नोर न करें। सूरज, व्यायाम, आहार और पॉजिटिव माइंडसेट से आप चमकदार रह सकते हैं। याद रखें, सर्दी सूर्योदय की पूर्वसूचना है। आज से शुरू करें – एक छोटा स्टेप जैसे 10 मिनट वॉक, ये आपमें फर्क लाएगा।
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