एंटीबायोटिक्स के 8 मिथक जो सुपरबग्स पैदा कर रहे हैं
हम बीमार होने से ज़्यादा बीमार महसूस करने से डरते हैं। हल्का बुखार, गले में खराश या शरीर टूटना और हमारे दिमाग़ में तुरंत एक ही आवाज़ आती है: “कुछ strong ले लेते हैं, कहीं बिगड़ न जाए।” यहीं से एंटीबायोटिक्स का गलत इस्तेमाल शुरू होता है।
यह सोच हमें बीमार नहीं, बल्कि असहज महसूस करने से बचाने की कोशिश होती है। लेकिन यही जल्दबाज़ी, यही डर और यही गलत धारणाएँ आज एक नए खतरे को जन्म दे रही हैं- सुपरबग्स।
सुपरबग्स कोई काल्पनिक शब्द नहीं हैं। ये असली बैक्टीरिया हैं, जिन पर अब आम एंटीबायोटिक्स असर नहीं करतीं। और हैरानी की बात यह है कि सुपरबग्स किसी लैब में नहीं, हमारी रोज़मर्रा की गलत सोच में पैदा हो रहे हैं।
एंटीबायोटिक्स ने लाखों जानें बचाईं, लेकिन गलत मिथकों ने इन्हें ही सबसे बड़ा खतरा बना दिया। भारत में 83% मरीजों में सुपरबग्स मिल रहे हैं – ये ऐसी बैक्टीरिया हैं जो सभी एंटीबायोटिक्स हरा देते हैं। अंदाज़ा है कि 2050 तक इससे 1 करोड़ मौतें होंगी।
सुपरबग्स का संकट
सुपरबग्स ऐसे बैक्टीरिया होते हैं जो: बार-बार ली गई एंटीबायोटिक्स से डरते नहीं, दवा के असर को पहचानकर खुद को बदल लेते हैं, इलाज को मुश्किल, लंबा और कभी-कभी जानलेवा बना देते हैं। सुपरबग्स वे बैक्टीरिया हैं जो एंटीबायोटिक्स का विरोध कर लेते हैं।
आज भारत सुपरबग्स का वैश्विक केंद्र बन चुका। Lancet स्टडी: के अनुसार 83% भारतीयों में MDRO (मल्टीड्रग रेसिस्टेंट ऑर्गेनिज्म) की समस्या है। अस्पतालों में 15 लाख इंफेक्शन केस, जिनमें सिर्फ 7.8% को सही इलाज मिला। अब सवाल यह है- ये सुपरबग्स बनते कैसे हैं? जवाब छिपा है हमारे कुछ आम लेकिन खतरनाक मिथकों में।
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एंटीबायोटिक्स से जुड़े खतरनाक मिथक
एंटीबायोटिक्स बैक्टीरियल इंफेक्शन के लिए हैं, जैसे यूरिन इंफेक्शन या टॉन्सिलाइटिस। वायरस (सर्दी, कोविड) पर यह बेअसर होता है। भारत में 70% प्रिस्क्रिप्शन बिना टेस्ट के होते हैं। हर समस्या का हल यहाँ एंटीबायोटिक्स हैं।
मिथक 1: सर्दी-खांसी-बुखार में एंटीबायोटिक्स लो, जल्दी ठीक
यह भारत का सबसे आम और खतरनाक मिथक है। 90% सर्दी वायरल होती है। एंटीबायोटिक्स बैक्टीरिया मारते हैं, वायरस नहीं। फिर भी लोग सर्दी-खांसी में ले लेते हैं। उसमें एंटीबायोटिक्स लेने से गट बैक्टीरिया बिगड़ते हैं, डायरिया या कमजोरी आती है। यदि सर्दी लम्बी चले और डॉक्टर कहें तो ही लें, अन्यथा हल्दी दूध या अदरक कालीमिर्च की चाय बेहतर होगी।
जब हम वायरल बीमारी में भी एंटीबायोटिक लेते हैं तो बैक्टीरिया बिना वजह दवा से परिचित हो जाते हैं। वे सीख लेते हैं कि दवा से कैसे बचना है यानी हम खुद उन्हें ट्रेनिंग दे देते हैं। हम बीमारी का कारण नहीं, सिर्फ़ जल्दी आराम देखना चाहते हैं।
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मिथक 2: कोर्स बीच में छोड़ दें तो कोई बात नहीं
यह आदत भविष्य की बीमारियों को जन्म देती है। जब आप एंटीबायोटिक्स दवा बीच में छोड़ते हैं: कमजोर बैक्टीरिया मरते हैं, मजबूत बच जाते हैं, और वही बचे हुए बैक्टीरिया आगे चलकर सुपरबग बन जाते हैं। यह बिल्कुल वैसा है जैसे- आधी आग बुझाकर चले जाना और सोचना कि सब सुरक्षित है।
अगली बार वो दवा बेअसर हो जाती है। इसे कहते हैं: Antibiotic Resistance, एक ऐसी समस्या, जिससे दुनिया डर रही है। बहुत से लोग लक्षण चले जाएं तो दवा बंद कर देते हैं। इससे सर्वाइविंग बैक्टीरिया मजबूत हो जाते हैं। WHO के मुताबिक, ये सुपरबग्स पैदा करता है। उदाहरण: टीबी की दवा बीच में छोड़ने से MDR‑TB हो सकता है, जिसका इलाज प्राइवेट सेक्टर में कई लाख रुपये (कई केसों में 20–25 लाख तक) का आर्थिक बोझ डाल सकता है।
एंटीबायोटिक्स को जब डॉक्टर कहें तभी बंद करें। 5-7 दिन का कोर्स पूरा करें।
मिथक 3: एंटीबायोटिक्स इम्यूनिटी बूस्ट करते हैं
कुछ लोग सोचते हैं कि महीने में 1-2 कोर्स एंटीबायोटिक लो तो इम्यूनिटी सुपर स्ट्रॉन्ग हो जाएगी, बीमारी नहीं आएगी। जबकि सच्चाई बिल्कुल उल्टा है! एंटीबायोटिक्स आपकी इम्यूनिटी को कमजोर करते हैं। अच्छे बैक्टीरिया मारकर शरीर का प्राकृतिक बचाव खत्म कर देते हैं। इम्यूनिटी कमजोर होने की वजह :
गट माइक्रोबायोम का नाश (70% इम्यूनिटी यहीं रहती): एंटीबायोटिक से अच्छे बैक्टीरिया मरते हैं जिससे गट फ्लोरा बिगड़ता है, इसकी वजह से इम्यून सिस्टम कमजोर होता है, बार-बार बीमारी आती है। Harvard Study: एंटीबायोटिक के 1 कोर्स के 6 महीने बाद भी गट बैक्टीरिया 50% रिकवर नहीं होते।
एंटीबायोटिक लेने से न्यूट्रोफिल्स (सफेद रक्त कोशिकाएं) संक्रमण लड़ने की क्षमता खो देती हैं। फंगल इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है जैसे- मुंह के छाले, योनि इंफेक्शन आदि। बार-बार एंटीबायोटिक लेने वालों में: सर्दी-जुकाम: 3x ज्यादा, गंभीर इंफेक्शन: 2x ज्यादा, अस्पताल भर्ती: 40% ज्यादा होती है।
डॉक्टरों की चेतावनी
WHO: “एंटीबायोटिक्स इम्यूनिटी किलर हैं, बूस्टर नहीं।”
Indian Chest Society: “वायरल में कभी न दें।”
मिथक 4: “स्ट्रांग एंटीबायोटिक जल्दी ठीक करती है”
लोग सोचते हैं कि इंजेक्शन या “बड़ा वाला” एंटीबायोटिक (जैसे मोनोबैक्टम) लो तो 2 दिन में बीमारी भाग जाएगी। ये सबसे खतरनाक मिथक है। “Strong” का मतलब ज़्यादा ताकतवर नहीं, सही बैक्टीरिया के लिए सही दवा होती है।
इससे अच्छे गट बैक्टीरिया भी मरते हैं जिस कारण डायरिया, कमजोरी होती है, रेजिस्टेंस तेजी से बढ़ता है जिससे सुपरबग्स बनते हैं। ये मिथक है कि इंजेक्शन से 2 दिन में ठीक हो जायेंगे, सच ये है कि गलत बैक्टीरिया पर दवा खाने से 10 दिन में भी नहीं ठीक होते। यदि कल्चर टेस्ट से सही दवा मिले तो 5-7 दिन में ठीक हो जायेंगे। हर बीमारी में strong दवा देना: भविष्य के लिए दरवाज़ा बंद करना है। “Strong एंटीबायोटिक = सुपरबग्स की फैक्ट्री। सही दवा = सही इलाज।”
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मिथक 5: कॉम्बो पैक (एंटी+विटामिन) सेफ
हमारे बाजार में एंटीबायोटिक्स+विटामिन B कॉम्प्लेक्स या मल्टीविटामिन के रेडीमेड कॉम्बो बहुत बिकते हैं। लोग सोचते हैं ये सुविधाजनक और सुरक्षित हैं। लेकिन ये रेजिस्टेंस को तेजी से बढ़ाते हैं क्योंकि जरूरत से ज्यादा एंटीबायोटिक्स बैक्टीरिया को मजबूत बनाते हैं।
भारत में 80% एंटीबायोटिक्स बिना प्रिस्क्रिप्शन बिकते हैं, जो वैश्विक रेजिस्टेंस का कारण हैं। ये कॉकटेल्स लिवर पर अतिरिक्त बोझ डालते हैं और सही डोज न मिलने से इंफेक्शन वापस आता है। डॉक्टर अलग-अलग प्रिस्क्राइब करें तो बेहतर होता है।
लोग मानते हैं कि विटामिन या मिनरल सप्लीमेंट्स एंटीबायोटिक्स के साथ लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता। गलत! कैल्शियम, मैग्नीशियम या आयरन वाली गोलियां एंटीबायोटिक्स के अब्सॉर्प्शन को 50% तक रोक देती हैं। ये मिनरल्स दवा से चिपक जाते हैं और पेट से बाहर निकल जाते हैं, जिससे इंफेक्शन ठीक नहीं होता।

मिथक 6: बिना प्रिस्क्रिप्शन एंटीबायोटिक लेना ठीक
यह बहुत आम है: “भैया वही दवा दे देना जो पिछली बार ली थी” लेकिन याद रखना चाहिए- हर बीमारी अलग, हर बार कारण अलग, हर शरीर अलग होता है। बिना डॉक्टर की सलाह के गलत दवा, गलत डोज़ और गलत अवधि तक चलती है, ये तीनों मिलकर सुपरबग्स का रास्ता बनाते हैं जो खतरनाक हो सकता है।
लोग सोचते हैं- मेडिकल स्टोर मतलब डॉक्टर। “दुकानदार ने दी है तो सही ही होगी”- हम मान लेते हैं: ये रोज़ दवाइयाँ देता है, इसे ज़्यादा पता होगा। मुझे डॉक्टर के पास जाने की क्या ज़रूरत है ? असल में हम जिम्मेदारी अपने ऊपर नहीं रखना चाहते। किसी और के कंधे पर डाल देना, दिमाग़ को आसान लगता है।
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मिथक 7: “सुपरबग्स व्यक्तिगत समस्या है, दूसरों को नहीं फैलती”
लोग सोचते हैं: “मेरे शरीर में सुपरबग बने तो मेरी ही प्रॉब्लम। दूसरों को क्या लेना-देना।” सच्चाई ये है कि सुपरबग्स सामाजिक बम हैं! आपका एक गलत एंटीबायोटिक कोर्स पूरे मोहल्ले, अस्पताल, देश को प्रभावित कर सकता है।
सुपरबग्स कैसे फैलते हैं? (चेन रिएक्शन): आपका गलत एंटीबायोटिक → सुपरबग बनता है → खांसी/छींक → हवा में → पड़ोसी को → पड़ोसी का परिवार → स्कूल → ऑफिस → अस्पताल → नर्स/डॉक्टर → अन्य मरीज, इस तरह वो फैलता जाता है।
1. हवा: खांसी, छींक (MRSA, TB)
2. संपर्क: हाथ मिलाना, दरवाजा पकड़ना (Klebsiella)
3. सतह: मोबाइल, बिस्तर, टॉयलेट (VRE 7 दिन जिंदा)
4. खाना-पानी: सब्जी, दूध (Salmonella)
5. अस्पताल उपकरण: कैथेटर, वेंटिलेटर
भारत के सुपरबग आउटब्रेक केस
2010: NDM-1 “New Delhi Superbug” भारत से UK गए मरीज के कारण यूरोप में सुपरबग फैला, 14 देश प्रभावित हुए, WHO ने इसे इमरजेंसी बतायी। 2024: ICMR Report- 83% भारतीयों में MDR बैक्टीरिया मिलते हैं, दिल्ली के 5 बड़े हॉस्पिटल का आंकड़ा सामने आया है- 40% ICU में मौत इसी वजह से हुई है।
चेतावनी: CDC: “एंटीबायोटिक रेजिस्टेंस व्यक्तिगत नहीं, सामुदायिक समस्या है।” WHO: “1 व्यक्ति द्वारा एंटीबायोटिक्स का गलत उपयोग = 10 लोगों को खतरा।” आज आपकी लापरवाही: कल किसी की सर्जरी, किसी की डिलीवरी, किसी छोटे बच्चे के इलाज को खतरे में डाल सकती है।
मिथक 8: आयुर्वेदिक सप्लीमेंट्स एंटीबायोटिक्स से कहीं बेहतर हैं
कुछ लोग आयुर्वेद को एलोपैथी से बेहतर मानकर बीमारियों में उनका सेवन करते हैं। च्यवनप्राश, अश्वगंधा या नीम की गोलियां इम्यूनिटी बूस्ट करती हैं, ये सही है। लेकिन गंभीर बैक्टीरियल इंफेक्शन जैसे निमोनिया या यूरिनरी ट्रैक्ट इंफेक्शन में एंटीबायोटिक्स जरूरी हैं।
आयुर्वेद सपोर्टिव है, रिप्लेसमेंट नहीं। इन दोनों का कॉम्बो इंटरैक्शन पैदा कर सकता है, जैसे त्रिफला एंटीबायोटिक्स अब्सॉर्बशन कम कर देता है। आयुर्वेदिक डॉक्टर से सलाह लें, दवा भी करें लेकिन इमरजेंसी में एलोपैथी चुनें।
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बचाव के नियम:
- डॉक्टर प्रिस्क्रिप्शन पर ही लें
- पूरा कोर्स जरूर करें
- दही साथ लें (2 घंटे बाद)
- साइड इफेक्ट्स तुरंत बताएं
- योग और प्राणायाम करें, इम्यूनिटी बढ़ेगी।
- पालतू जानवर के एंटीबायोटिक चेक करें।
- हाइजीन और साफ पानी का ध्यान रक्खें।
निष्कर्ष
एंटीबायोटिक्स ने दुनिया को बचाया है, लेकिन अब ज़रूरत है उन्हें हमारी गलत सोच से बचाने की। जब हम समझ के साथ दवा लेते हैं,
तो शरीर ही नहीं, भविष्य भी सुरक्षित रहता है। दवा ज्ञान के साथ ली जाए तो इलाज है, और भ्रम के साथ ली जाए तो बीमारी। आज ज़रूरत है: कम दवाइयों की- ज़्यादा समझ की और सही जानकारी की।
स्वस्थ रहने का रास्ता गोलियों से नहीं, सचेत सोच से होकर जाता है। सुपरबग्स किसी अस्पताल में नहीं, हमारी गलत धारणाओं में पैदा होते हैं। जब हम: सही वजह से, सही सलाह से, पूरी अवधि तक एंटीबायोटिक लेते हैं- तो हम: खुद को भी बचाते हैं और आने वाली पीढ़ियों को भी।
इस लेख को अपने सभी मित्रों और परिचितों तक जरूर पहुचायें। ये आपके परिवार को सुरक्षित रखने के लिए जरुरी है।
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