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बच्चों के व्यवहार को पॉजिटिव शेप देने के 12 वैज्ञानिक तरीके

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बच्चों के व्यवहार को पॉजिटिव शेप देने के 12 वैज्ञानिक तरीके

बच्चों के व्यवहार को पॉजिटिव शेप देने के तरीके

आज के समय में लगभग हर माता-पिता यह सवाल खुद से पूछते हैं- “मेरा बच्चा बात नहीं मानता”, “जल्दी गुस्सा हो जाता है”, “मोबाइल से चिपका रहता है”, “ज़िद्दी होता जा रहा है”।

अक्सर हम बच्चों के व्यवहार को गलत मान लेते हैं, लेकिन विज्ञान कहता है- हर व्यवहार एक संदेश होता है, समस्या नहीं। बच्चों का दिमाग अभी “निर्माण अवस्था” में होता है। उनका व्यवहार इस बात का संकेत देता है कि वे क्या महसूस कर रहे हैं, न कि वे कैसे बिगड़ रहे हैं।

बच्चों का व्यवहार उनके भविष्य की नींव होता है। सकारात्मक तरीकों से इसे आकार देकर माता-पिता न केवल अच्छे नागरिक बना सकते हैं, बल्कि बच्चे के आत्मविश्वास और भावनात्मक स्वास्थ्य को भी मजबूत कर सकते हैं।

यह लेख आपको बताएगा कि कैसे मनोविज्ञान, न्यूरोसाइंस और व्यवहार विज्ञान की मदद से बच्चों के व्यवहार को डाँट-डपट नहीं, समझ और सही दिशा से बदला जा सकता है।

क्यों जरूरी है व्यवहार को शेप देना?

बच्चा चिल्ला रहा है, रो रहा है, चीज़ें फेंक रहा है- यह सब देखकर हम कहते हैं: “यह बच्चा बहुत बदतमीज़ है” लेकिन मनोविज्ञान कहता है: बच्चों में आत्म-नियंत्रण (Self-Regulation) पूरी तरह विकसित नहीं होता। उनका दिमाग भावनाओं को संभालना सीख ही रहा होता है।

इसलिए जब बच्चा गलत व्यवहार करता है, तो असल में वह यह कह रहा होता है-“मैं अभी खुद को संभाल नहीं पा रहा।” जब आप व्यवहार के पीछे की भावना समझते हैं, तो समाधान आसान हो जाता है।

बच्चों में नेगेटिव व्यवहार जैसे गुस्सा या जिद- स्क्रीन टाइम, पारिवारिक तनाव या पढाई/स्कूल के दबाव से आता है। पॉजिटिव शेपिंग से आत्म-सम्मान बढ़ता है, भावनात्मक नियंत्रण सुधरता है और माता-पिता-बच्चे का बंधन मजबूत होता है। अध्ययनों से पता चलता है कि यह लंबे समय तक अच्छे व्यवहार को स्थायी बनाता है।

सकारात्मक सुदृढ़ीकरण क्या है?

सकारात्मक सुदृढ़ीकरण का मतलब है- अच्छे व्यवहार पर तुरंत प्रशंसा या पुरस्कार देना, जो बच्चे को उसे दोहराने के लिए प्रेरित करता है। मनोविज्ञान में यह तकनीक व्यवहार परिवर्तन का आधार है, क्योंकि यह बच्चे के दिमाग में डोपामाइन रिलीज करती है और सीखने को मजेदार बनाती है। भारतीय घरों में इसे स्टार चार्ट या छोटे उपहारों से लागू किया जा सकता है, जैसे होमवर्क पूरा करने पर अतिरिक्त खेलने का समय।

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मुख्य 12 तकनीकें:

1. गुणवत्ता का समय दो

बच्चे को रोज 15-20 मिनट फुल अटेंशन दो– बस खेलो या बात करो। “आज तुमने क्या किया?” पूछो। इससे बच्चा वैल्यूड फील करता है, नेगेटिव बिहेवियर कम होता है। साइंस कहता है, ये बॉन्डिंग हॉर्मोन ऑक्सीटोसिन बढ़ाता है।

यह सबसे शक्तिशाली तरीका है। दिन के सिर्फ 15 मिनट: बिना मोबाइल, बिना सलाह, बिना सुधार सिर्फ बच्चे के साथ, उसके तरीके से रहना। यह समय बच्चे के दिमाग में यह संदेश डालता है कि “मैं महत्वपूर्ण हूँ।” ऐसा बच्चा ध्यान पाने के लिए गलत व्यवहार नहीं करता।

2. खुद अच्छा रोल मॉडल बनो

बच्चे मम्मी-पापा को कॉपी करते हैं यह तो आप जानते होंगें। इसलिए गुस्सा आए तो सांस लो और शांत रहो। “मैं थोड़ा ब्रेक लेता हूँ” ऐसा बोलो। बच्चा वैसा ही सीखेगा। स्टडीज दिखाती हैं, मॉडलिंग 70% बिहेवियर बदल सकती है।

बच्चे आपकी बात नहीं, आपका व्यवहार सीखते हैं।अगर आप: मोबाइल पर ज़्यादा रहते हैं, बात-बात पर झुँझलाते हैं तो बच्चा भी वही सीखेगा। न्यूरोसाइंस इसे Mirror Neurons का प्रभाव कहता है- बच्चे का दिमाग अपने आस-पास देखे गए व्यवहार को ऑटोमेटिक सीख लेता है। आप जैसा बनाना चाहते हैं बच्चा वैसा हो, इसके लिए पहले खुद वैसा बनिए।

Mirror Neurons

3. शाबाशी नहीं, प्रयास की सराहना करें

अगर आप कहते हैं- “तुम बहुत होशियार हो” तो इस प्रशंसा से बच्चा डरने लगता है कि कहीं गलती हो गई तो क्या होगा ? लेकिन अगर आप कहते हैं- “तुमने बहुत मेहनत की” तो बच्चा सीखता है- कोशिश करना ज़रूरी है, प्रयास करना जरुरी है, परफेक्ट होना नहीं। इसे मनोविज्ञान में Growth Mindset कहते हैं।

“गुड जॉब” मत बोलो, “वाह, तूने खिलौना शेयर किया, कितना कूल!” ऐसा कहो। ये शब्द ब्रेन में डोपामाइन रिलीज करता है, अच्छा काम दोहराने को मन करता है। जनरल तारीफ उन्हें भूल जाती है।

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4. स्क्रीन टाइम कंट्रोल करो

ज्यादा मोबाइल-टीवी से बच्चे चिड़चिड़े, नींद न आने वाले और कम फोकस वाले हो जाते हैं। WHO कहता है 2-5 साल के बच्चों के लिए 1 घंटा से कम, 5-17 साल वालों के लिए 2 घंटे की डेली लिमिट रखो। टाइम खत्म तो मोबाइल लॉक हो जाए। खाने, होमवर्क, सोने से पहले NO SCREEN।
बच्चे को अल्टरनेटिव दो- बाहर क्रिकेट खेलो, स्टोरी पढ़ो, पार्क जाओ, साइकिलिंग करो। बच्चे का रोल मॉडल बनने के लिए अपना स्क्रीन टाइम भी कम करना होगा। स्क्रॉलिंग की जगह वॉक, योग या फैमिली चैट। रात 9 बजे फोन चार्जर पर, किताब पढ़ो। बच्चे अगर देखेंगे मम्मी-पापा फोन में डूबे हैं, तो वो भी वैसा करेंगे। शुरू में मुश्किल लगेगा, लेकिन 1 हफ्ते में आदत बनेगी। ट्राई करो, फर्क दिखेगा!

5. छोटी जिम्मेदारियाँ दो

घर में जिम्मेदारियां मिलने और उन्हें ढंग से पूरा करने पर इनाम मिलने से बच्चों में ज़िद और चिड़चिड़ापन कम होता है। उम्र के हिसाब से काम सौंपो – 5 साल का बच्चा बर्तन सेट करके रखे, 10 साल का रूम साफ करे। 15+ बच्चे किचन और गार्डनिंग में मदद करें तो उन्हें पॉजिटिव ऊर्जा मिलती है। सफल होने पर उन्हें गले से लगाएं, पीठ थपथपाएं। ये सेल्फ-एस्टिम बढ़ाता है, दिमाग खुराफात से हटकर क्रिएटिव होता है। ।

6. सीमाएँ ज़रूरी हैं, लेकिन सज़ा नहीं

बिना सीमा का बच्चा अपने आप को असुरक्षित महसूस करता है। लेकिन डर से बनी सीमा, व्यवहार नहीं सुधारती। इसलिए सीमाएं तय करें लेकिन बच्चों की सहमति से। विज्ञान कहता है- नियम कम हों, लेकिन हर बार वही नियम लागू हों और गुस्से में नहीं, शांति से समझाए जाएँ। सज़ा बच्चे को डराती है, सीमा उसे सुरक्षित बनाती है।

“क्यों किया ये?” पूछो, फिर समाधान ढूँढो। “अगली बार ऐसे ट्राय करना, गड़बड़ नहीं होगी” ऐसा बोलो। ये इमोशनल इंटेलिजेंस सिखाता है, CBT तकनीक जैसा। बच्चों को डांट से डर लगता है। डांटने से बच्चे ज़िद्दी होते हैं।

7. बच्चे को सुना जाना चाहिए

कई माता-पिता सोचते हैं -“बच्चा छोटा है, इसे क्या समझ आएगा?” लेकिन शोध बताते हैं कि जब बच्चे को सुना जाता है, तो उसके दिमाग में सुरक्षा और विश्वास का हार्मोन (Oxytocin) सक्रिय होता है।

जब बच्चा कहता है-“मुझे अच्छा नहीं लग रहा”और आप जवाब देते हैं- “अरे कुछ नहीं हुआ”, तो बच्चा यह सीखता है कि मेरी भावनाएँ महत्वहीन हैं, कोई मुझे समझ नहीं रहा है। लेकिन अगर आप कहते हैं- “मुझे दिख रहा है कि तुम परेशान हो” तो बच्चा भावनात्मक रूप से शांत होने लगता है।

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8. सकारात्मक भाषा ज़्यादा शक्तिशाली

हम अक्सर बच्चों से कहते हैं- “भागो मत” “चिल्लाओ मत” “गंदा मत करो” “वहां मत जाओ”

हमें याद रखना चाहिए कि दिमाग “मत” शब्द को प्रोसेस नहीं करता। वह सिर्फ क्रिया पकड़ता है- मतलब भागो, चिल्लाओ, गन्दा करो, वहां जाओ। इसलिए कहिए- “धीरे चलो” “धीमी आवाज़ में बोलो” सफाई रखना अच्छा होता है, “खिलौने डिब्बे में रखो” ऐसी सकारात्मक भाषा बच्चों के दिमाग को स्पष्ट निर्देश देती है।

9. नेगेटिव इग्नोर करो, पॉजिटिव नोटिस करो

छोटी जिद पर ध्यान मत दो, अच्छे काम पर जोर दो। अटेंशन नेगेटिव को बढ़ावा देती है। जब बच्चा नेगेटिव व्यवहार करता है (जैसे जिद, चिल्लाना) सिर्फ ध्यान देने के लिए, तो उसे बिल्कुल इग्नोर कर दो। ध्यान न मिलने पर वो व्यवहार अपने आप खत्म हो जाता है।

अटेंशन एक तरह का ईंधन है : बच्चा चिल्लाता है तो मम्मी-पापा रिएक्ट करते हैं (डांटो या लाड़ करो)- ये उसे “रिवॉर्ड” मिलता है। व्यवहार और बढ़ता है। इग्नोर = ईंधन खत्म: चुपचाप रहो, मुंह मत खोलो, न देखो, न छुओ। बच्चा कन्फ्यूज होकर रुक जाएगा। 2-3 बार में जिद्द की आदत छूट जाती है। ध्यान रहे- कभी अच्छे बिहेवियर को इग्नोर मत करो।

गुस्से में बच्चे को अकेला मत छोड़ो, साथ बैठो। “गुस्सा आया ना? ठीक है, सबको आता है।”चलो लम्बी सांस खीचों और छोडो”। अगली बार गुस्सा आए तो हाथ धो लो। ये इमोशन्स को कंट्रोल करना सिखाता है, आत्मविश्वास बढ़ाता है।

 10. तुलना से आत्मविश्वास टूटता है

भारतीय परिवारों में ये समस्या बहुत आम है। “देखो शर्मा जी के बेटा फर्स्ट आया है” “देखो वो बच्चा कितना अच्छा है” यह वाक्य बच्चे के दिमाग में हीन भावना पैदा करता है। हर बच्चा इस दुनियां में अलग दिमाग, अलग गति और अलग भावनाओं के साथ आता है। तुलना व्यवहार को  सुधारती नहीं है बल्कि बच्चे की पहचान, उसका आत्मविश्वास तोड़ती है।

तुम जैसे भी हो बेस्ट हो, ये अहसास बच्चे को होना चाहिए तब उसका सही शेप निखरता है।

मीम्स और फनी कंटेंट का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

11. माता-पिता का मानसिक स्वास्थ्य सबसे बड़ा कारक

थके हुए, तनावग्रस्त माता-पिता चाहे जितनी किताबें पढ़ ले- बच्चे के व्यवहार को सकारात्मक नहीं बना पाएंगे। क्योंकि बच्चा आपकी ऊर्जा पढ़ता है, शब्द नहीं। माता-पिता का मानसिक स्वास्थ्य बच्चे के व्यवहार की नींव होता है। तनावग्रस्त, थके या चिड़चिड़े माता-पिता अनजाने में वही भावनाएँ बच्चे तक पहुँचा देते हैं। उन्हें पता भी नहीं चलता की बच्चा उनकी वजह से बिगड़ रहा है।

बच्चे शब्दों से ज़्यादा माता-पिता की भावनात्मक स्थिति और ऊर्जा को महसूस करते हैं। इसलिए शांत, खुश, संतुलित और आत्म-सचेत माता-पिता ही सकारात्मक बच्चे का निर्माण कर पाते हैं।

12. कंसिस्टेंट रहो

कंसिस्टेंसी यानी रोज एक जैसा व्यवहार करना बच्चों के व्यवहार शेपिंग का सबसे पावरफुल सीक्रेट है। कभी “हाँ” कभी “ना” बोलोगे तो बच्चा कन्फ्यूज हो जाता है- वो सोचेगा “पापा आज मान गए, कल फिर ट्राई करूँगा”। लेकिन रोज एक ही रूल फॉलो करोगे तो बच्चे का दिमाग क्लियर मैसेज पकड़ लेता है और अच्छी आदतें परमानेंट हो जाती हैं।

स्टडीज दिखाती हैं कि कंसिस्टेंट अप्रोच से 85-95% मामलों में नेगेटिव व्यवहार 4-6 हफ्तों में खत्म हो जाता है। शुरुआत में चैलेंजेस आएंगे- पहले 3-5 दिन जिद बढ़ेगी। हिम्मत रखो, इग्नोर करो। पार्टनर को सपोर्ट लो। फिर धीरे धीरे वो नियम को फॉलो करने लगेगा।

कंसिस्टेंसी “मसल मेमोरी” जैसी है- जिम में रोज वर्कआउट से बॉडी शेप होती है, वैसे ही बच्चों के ब्रेन में अच्छे पैटर्न बनते हैं। 21 दिन लगातार करो, लाइफटाइम आदत बनेगी।

क्या हर इंसान के अंदर एक छोटा बच्चा छिपा होता है?

उम्र के हिसाब से व्यवहार शेपिंग

उम्रमुख्य तकनीकेंउदाहरणविज्ञानसावधानी
3-5 साल
प्रेस्कूल
 तारीफ
खेल-रूटीन
टाइम-इन
 स्टिकर शेयरिंग पर
5 मिनट ब्लॉक्स
गुस्से में गले लगाना
70% सफलता। ABA प्रमाणितलंबे लेक्चर न दें, खेल में सिखायें
6-12 साल
स्कूल
 जिम्मेदारी
पॉइंट सिस्टम
स्क्रीन कंट्रोल
कंसिस्टेंसी
 बर्तन रखना=1 स्टार
5 स्टार=गेम टाइम
होमवर्क पहले
90% सफल। ब्रेन डेवलपमेंटस्कूल स्ट्रेस को समझें
13+ साल
टीनएजर
 बातचीत
स्पेसिफिक फीडबैक
स्मार्ट रिवॉर्ड
रोल मॉडल
 “गुस्सा क्यों?”
फॅमिली ट्रिप चुनना
पैरेंट्स भी फोन कम करें
65% इमोशन कंट्रोलजज न करें- पहले सुनो, समझो

निष्कर्ष:

भारतीय परिवारों में पूजा, त्योहार या खेल के जरिए पॉजिटिव शेपिंग आसान है। बस डांट-फटकार से बचें, क्योंकि यह भय पैदा करती है न कि सीख। पुरस्कार तुरंत दें, विलंब से प्रभाव कम होता है। नेगेटिव को ज्यादा ध्यान न दें, अच्छे पर फोकस करें।

बच्चे को बदलने से पहले, नज़रिए को बदलना ज़रूरी है। बच्चे का व्यवहार: उसकी भाषा है, उसकी मदद की पुकार है, उसकी अधूरी क्षमता का संकेत है। जब आप सज़ा से नहीं, समझ से प्रतिक्रिया देते हैं तभी बच्चे का व्यवहार सच में बदलता है। ये तरीके न केवल व्यवहार सुधारते हैं, बल्कि स्कूल प्रदर्शन, रिश्ते और मानसिक स्वास्थ्य बेहतर करते हैं। सकारात्मक पेरेंटिंग से बच्चे जिम्मेदार, खुश और आत्मनिर्भर बनते हैं।

यदि आप भी बच्चों में ऐसी समस्या से जूझ रहे हैं तो अपने अनुभव हमें बताएं। इस लेख को अपने मित्रों में शेयर करें सभव है किसी को इसकी ज्यादा जरुरत हो। 

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