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दिमाग भूल जाए, पर शरीर दर्द को नहीं भूलता: Somatic Memory

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दिमाग भूल जाए, पर शरीर नहीं भूलता: Somatic Memory

Somatic Memory

दिमाग और शरीर दो ऐसे अद्भुत अंग हैं जो हमारी जिंदगी के अनुभवों को संग्रहीत करते हैं। जब हम सामान्य रूप से स्मृति के बारे में सोचते हैं, तो हमारा ध्यान मुख्यतः दिमाग की याददाश्त की ओर जाता है। लेकिन कई बार ऐसा होता है कि हमारा मस्तिष्क किसी घटना को भूल जाता है, परंतु हमारा शरीर उससे जुड़ी पुरानी प्रतिक्रियाओं को याद रखता है।

हम अक्सर मानते हैं कि दर्द, डर या ट्रामा सिर्फ दिमाग में रहता है। पर आधुनिक न्यूरोसाइंस बता चुका है कि शरीर की अपनी भी एक “याददाश्त” होती है—जिसे कहा जाता है सोमैटिक मेमोरी या दैहिक स्मृति (Somatic Memory)।

यह मेमोरी हमारे शरीर की टिशूज़, मसल्स, दिल की धड़कन, और nervous system में एकत्र होती है। दिमाग चाहे किसी घटना की तस्वीरें और जानकारी पूरी तरह भूल जाए…लेकिन शरीर उस दर्द की भावना, तनाव और डर की प्रतिक्रिया को कभी नहीं भूलता। यह ब्लॉग इसी विषय पर विस्तार से चर्चा करेगा कि आखिर क्यों हमारा दिमाग भूलता है, पर शरीर उस अनुभव को भूल नहीं पाता।

सोमैटिक मेमोरी क्या है?

दैहिक स्मृति या सोमैटिक मेमोरी उस प्रकार की यादों को कहते हैं जो हमारे शरीर के अंगों और तंत्रिकाओं में जमा होती है। यह मुख्य रूप से उन भावनात्मक घटनाओं से जुड़ी होती है जिनका अनुभव हमने शारीरिक स्तर पर किया होता है। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति बचपन में किसी दुर्घटना का अनुभव करता है, तो दिमाग भले ही उसे याद न रख पाए, पर शरीर उस घटना से जुड़ी तनावपूर्ण प्रतिक्रियाओं को सहेज कर रखता है।

जब भी उस व्यक्ति को कोई ऐसी परिस्थिति मिलती है जो उस दुर्घटना से मिलती-जुलती होती है, शरीर अपने स्तर पर प्रतिक्रिया करता है जैसे कि हृदय की धड़कन तेज होना या सांस लेने में कठिनाई होना। दैहिक स्मृति का अर्थ है—शरीर में संचित वे यादें, जिन्हें हम सोच-समझकर याद नहीं कर पाते, लेकिन जिनका प्रभाव हमारा शरीर लगातार दिखाता रहता है। ये यादें शब्दों या घटनाओं के रूप में नहीं, बल्कि अनुभूतियों (sensations) के रूप में जमा होती हैं—जैसे:

  • साँस लेने के तरीके में बदलाव
  • तनाव (stress) की प्रतिक्रिया
  • मांसपेशियों का कस जाना (muscle tension)
  • दिल की धड़कन तेज होना
  • अचानक डर, बेचैनी या घबराहट का उठना
  • भावनाओं का अनियंत्रित हो जाना

यानी घटना भले ही दिमाग से मिट जाए, उसका असर शरीर के भीतर संवेदनाओं और प्रतिक्रियाओं के रूप में जीवित रहता है। उदाहरण: दिमाग को पुरानी घटना याद नहीं, पर वही आवाज़, गंध या माहौल मिलते ही आज भी दिल धड़कने लगता है।

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दिमाग़ और शरीर की यादें कैसे जुड़ी होती हैं?

दिमाग और शरीर एक दूसरे के साथ तंत्रिका तंत्र के माध्यम से जुड़े होते हैं। मस्तिष्क ही नहीं, बल्कि शरीर की भी कुछ स्मृतियां होती हैं, जिन्हें हम शारीरिक अनुभव या “बॉडी मेमोरी” कहते हैं। यह अवधारणा इस बात पर आधारित है कि भावनाएं केवल मस्तिष्क में नहीं, बल्कि पूरे शरीर में फैली होती हैं।

जब हम किसी तनाव या दर्दनाक अनुभव से गुजरते हैं, तो मस्तिष्क के अलावा हमारे स्नायु तंत्र, मांसपेशियां और अन्य अंग भी उस अनुभव को अपनी प्रणाली में रिकॉर्ड कर लेते हैं। PTSD (पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर) में अक्सर देखने को मिलता है कि व्यक्ति किसी भयंकर घटना को भले ही याद न रखे, लेकिन वह घटना शरीर में गहरे भावनात्मक और शारीरिक तनाव के रूप में रहती है।

Somatic Memory in nervous system

 शरीर क्यों नहीं भूलता ?

शरीर दर्द को क्यों याद रखता है, दिमाग के भूल जाने के बावजूद? यह एक बड़ा प्रश्न है।

1. Survival Mechanism: शरीर की सुरक्षा प्रणाली

शरीर का पहला काम है- आपको सुरक्षित रखना। जो भी घटना आपको डराती या हानि पहुँचाती है, शरीर उसे “danger blueprint” की तरह स्टोर कर लेता है। वो एक खतरनाक अनुभव की तरह बस जाता है। दिमाग उस घटना को भूल सकता है लेकिन शरीर उसे भूलने नहीं देता क्योंकि हमारी सुरक्षा उससे जुडी होती है।

 2. तनाव वाले हार्मोनों का शरीर पर निशान (Imprint)

जब कोई गहरी चोट, दुख या भावनात्मक दर्द होता है, तब शरीर में कोर्टिसोल और एड्रेनलिन जैसे तनाव वाले हार्मोन अचानक बहुत बढ़ जाते हैं। इन हार्मोनों का असर शरीर के ऊतकों, नसों और मांसपेशियों पर गहरा निशान छोड़ देता है। इन्हीं निशानों से एक तरह की “शारीरिक याद” बन जाती है — जिसे शरीर बहुत लंबे समय तक संजोकर रखता है, भले ही दिमाग भूल क्यों न जाए।

3. अंतर्निहित यादें (Non-verbal Memory)

शरीर की यादें बोलकर व्यक्त नहीं होतीं। इनमें किसी कहानी का क्रम नहीं होता, सिर्फ संवेदनाएँ (sensations) और भावनाएँ (emotions) होती हैं। इसी वजह से: “क्यों डर लगता है?” यह याद नहीं रहता, लेकिन शरीर हर बार वैसी ही प्रतिक्रिया देता है।

4. नसों की प्रणाली का पैटर्न सीखना

लगातार तनाव या किसी दर्दनाक अनुभव से नर्वस सिस्टम उसी प्रतिक्रिया का ढर्रा (pattern) सीख लेता है। संभव है आज आपका तर्कसंगत दिमाग कहे—“सब ठीक है”… लेकिन शरीर का अनुभव कहे—“यह जगह सुरक्षित नहीं लगती।” क्योंकि शरीर को सब याद रहता है।

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शरीर में दर्द और सदमा (Trauma) कैसे जमा होता है?

बचपन के डर: बचपन की घटनाओं की बारीकियाँ भूल जाती हैं, लेकिन तेज़ आवाज़, गुस्सा या अस्वीकार किए जाने पर शरीर आज भी उसी तरह सिमट जाता है। किसी ने बचपन में डाँटा, याद नहीं है… पर अब भी तेज आवाज़ सुनते ही दिल तेज धड़कता है। माता-पिता की लड़ाई, स्कूल में बार-बार शर्मिंदा करना, physical punishment जैसी घटनाएं नहीं भूलती।

दुर्घटना का सदमा: कई लोग स्वयं के साथ घटी, या आँखों देखी दुर्घटना की पूरी बात याद नहीं रखते, या कहें कि भूल जाते हैं लेकिन गाड़ी का स्टीयरिंग पकड़ते ही हाथ अपने-आप कस जाते हैं। एकाग्रता भंग होती रहती है।

विषाक्त (Toxic) रिश्तों का असर: कभी किसी अपमानजनक या डराने वाले साथी या रिश्तेदार की आवाज़, लहजा या बोलने का तरीका— नए रिश्तों में भी डर जगा सकता है, भले ही परिस्थितियां बदल चुकी हो, पुरानी घटनाएं दिमाग भूल चूका हो। हॉस्पिटल की महक से दिक्कत होना, injection देखते ही डर, ये सारी प्रतिक्रिया शरीर में स्टोर यादों की वजह से होती हैं।

संकेत कि आपका शरीर पुराना दर्द थामे हुए है

ये लक्षण बताते हैं कि शरीर की पुरानी शारीरिक यादें (Somatic Memory) अभी भी आपके अंदर सक्रिय हैं:

1. बिना किसी स्पष्ट कारण के घबराहट या बेचैनी

2. अचानक किसी गंध, आवाज़ या जगह से डर या तनाव महसूस होना

3. शरीर का अकड़ जाना, कंधों में लगातार खिंचाव

4. पेट में अचानक कसाव या सिकुड़न

5. सीने में भारीपन या दबाव

6. किसी खास व्यक्ति के सामने अनायास असहज महसूस करना

7. कुछ परिस्थितियों से बचने की आदत (Avoidance)

8. बिना वजह उदासी या गुस्सा उभर आना

9. बार-बार थकान या ऊर्जा की कमी महसूस होना

10. अचानक शरीर का सुन्न हो जाना या freeze हो जाना

11. बेवजह लोगों को खुश करने की आदत

ये सभी शरीर की पुरानी दबी हुई यादों का अनजाने में दोहराया जाना (unconscious replay) है।

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Impact of Somatic Memory

क्या Somatic Memories वैज्ञानिक रूप से साबित हैं?

अनेक शोधों से यह साबित हो चूका है की सोमेटिक मेमोरी हम सब में एक्टिव है। आज का तंत्रिका-विज्ञान (neuroscience) मानता है कि:

  • शरीर का अपना एक अलग “याद रखने का सिस्टम” होता है
  • सदमा (trauma) केवल दिमाग में नहीं, शरीर के ऊतकों और नसों में भी जमा होता है
  • नर्वस सिस्टम की सीख (learning) पूरे शरीर में फैली होती है
  • हर मांसपेशी, हर नस और हर अंग भावनाओं पर प्रतिक्रिया देता है

Bessel van der Kolk की प्रसिद्ध किताब “The Body Keeps the Score” जो दुनिया के सबसे मान्यता-प्राप्त ट्रामा शोधों में से एक है इसने इन अवधारणाओं को वैज्ञानिक रूप से स्थापित किया है।

खुद को दोष देना बंद करें: यह आपकी गलती नहीं है

Somatic Memory अपने-आप होती है। इसे आपने जानबूझकर नहीं चुना। यह आपके शरीर का तरीका था, आपको बचाने का- जैसे वह उस समय सीख पाया। इसलिए जब आप खुद से पूछते हैं—

-“मैं अचानक इतना डर क्यों जाता हूँ?”
– “मेरा शरीर ऐसे क्यों प्रतिक्रिया देता है?”
– “मैं दूसरों की तरह सामान्य क्यों नहीं महसूस करता?”

तो एक बात याद रखिए—आपमें कोई कमी नहीं है। आपका शरीर सिर्फ यह कह रहा है, कि “मैं अभी भी खुद को सुरक्षित रखने की कोशिश कर रहा हूँ।”

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Somatic Memory से बाहर निकलने के प्रमुख उपाय

शरीर में जमी हुई यादें या पुराने अनुभवों का प्रभाव अगर आपकी सेहत या जीवनशैली पर असर डाल रहा है, तो उससे उबरने के लिए कुछ विज्ञान-सम्मत और व्यावहारिक उपाय हैं। इन तरीकों से आप शरीर और मन में जमा पुरानी भावनात्मक या ट्रॉमा संबंधी स्मृतियों को पहचानकर धीरे-धीरे मुक्त हो सकते हैं-

1. सोमैटिक थेरेपी (Somatic Therapy)

यह एक विज्ञान-आधारित थेरेपी है जिसमें शरीर की संवेदनाओं की गहराई से पहचान और महसूस करना सिखाया जाता है। यह तकनीक मुख्य रूप से मांडफुलनेस, सांस पर ध्यान, बॉडी स्कैन और हल्के मूवमेंट के जरिए काम करती है।

2. शारीरिक गतिविधियां और योग

योग, डांस, स्ट्रेचिंग और विशेष शारीरिक एक्सरसाइज से शरीर में जमा तनाव और स्मृति को धीरे-धीरे मुक्त किया जा सकता है। कुछ योगासन (जैसे हिप ओपनर पोज़, चाइल्ड पोज़) शरीर की गहरी स्मृतियों के रिलीज़ में मददगार हैं।  माइंडफुल मूवमेंट से शारीरिक-मानसिक संबंध फिर से मजबूत होते हैं।

3. माइंडफुलनेस और ग्राउंडिंग

ध्यान, सांस-संबंधी अभ्यास और शरीर के प्रति जागरूकता विकसित करना बहुत लाभकारी है। गाइडेड मेडिटेशन व ग्राउंडिंग एक्सरसाइजेस आपको वर्तमान में वापस लाती हैं और पुरानी दर्दनाक स्मृतियों का प्रभाव कम करती हैं।

4. क्रिएटिव एक्‍सप्रेशन

जर्नलिंग, आर्ट, म्यूजिक, डांस जैसे क्रिएटिव माध्यमों से भी भावनात्मक अनुभवों का सुरक्षित रूप से निष्कासन किया जा सकता है।
यह तरीका तब कारगर होता है जब समस्या को शब्दों में व्यक्त करना कठिन हो।

5. बॉडीवर्क व थेरेप्यूटिक टच

मसाज, एक्यूपंक्चर, क्रैनियोसैक्रल थेरेपी जैसी बॉडीवर्क विधियाँ शरीर में जमा टेंशन और ट्रॉमा को रिलीज करने में असरदार हैं। इनका असर मांसपेशियों में जमी भावनात्मक यादों को कम करने में होता है।

6. प्रोफेशनल हेल्प लें

अगर शरीर में जमी यादें बहुत पुरानी, गहरी या रोजमर्रा की जिंदगी में रुकावट बन रही हैं, तो प्रोफेशनल थेरेपिस्ट की मदद लें।
लाइसेंस प्राप्त मनोचिकित्सक, ट्रामा काउंसलर या योग थेरपिस्ट से थेरेपी लें जो Somatic Memory रिलीज की तकनीकों में निपुण हों।

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निष्कर्ष

हमारा दिमाग भूल सकता है, लेकिन शरीर की स्मृति हमें हमारे जीवन के गहरे अनुभवों से जोड़ती रहती है। यह स्मृति हमारे व्यवहार, निर्णय और भावनात्मक प्रतिक्रियाओं को प्रभावित करती है। दैहिक स्मृति का अध्ययन हमें यह समझने में मदद करता है कि कैसे हमारे शरीर में जमा अनुभवों को पहचान कर हम मानसिक और शारीरिक सेहत बेहतर बना सकते हैं।

दिमाग कहानियाँ सुनाता है। लेकिन शरीर, हर अनुभव का energy-level imprint रखता है। इसलिए कई बार हीलिंग दिमाग से नहीं, शरीर से शुरू होती है। Somatic Memories हमें बताते हैं कि ट्रामा सिर्फ मानसिक नहीं होता, शरीर भी एक बड़ा data store है और शरीर हमें रास्ता दिखाता है कि हमने कहाँ चोट खाई है। आपका शरीर आपका दुश्मन नहीं, आपका इतिहास है। और healing, उस इतिहास को समझने से शुरू होती है।

यह विषय मनोविज्ञान, न्यूरोसाइंस और चिकित्सा के लिए एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन रहा है, जो भविष्य में और अधिक शोध और चिकित्सा सुधारों के लिए रास्ता खोलता है।

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