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एग्जाम स्ट्रेस: क्यों टूट रहे हैं बच्चे और उन्हें कैसे बचाएँ

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एग्जाम स्ट्रेस: क्यों टूट रहे हैं बच्चे और उन्हें कैसे बचाएँ

exam stress in students

हर साल एग्जाम का मौसम आते ही एक अजीब-सी खामोशी घरों में उतर आती है। किताबें खुली होती हैं, लेकिन चेहरे बंद। माँ-बाप उम्मीदों से भरे होते हैं, और बच्चे…दबाव से।

एग्जाम केवल एक परीक्षा नहीं रह गए हैं। वे बच्चों के लिए डर, तुलना, अपेक्षाओं और असफलता के भय का केंद्र बन चुके हैं।
यही वजह है कि आज सवाल सिर्फ “नंबर कितने आए?” का नहीं,
बल्कि यह है कि बच्चे भीतर से क्यों टूट रहे हैं?

इस ब्लॉग में हम इस समस्या के कारण, संकेत और 8 प्रभावी उपाय जानेंगे।

भारत में एग्जाम स्ट्रेस का भयावह रूप

भारत में हर साल बोर्ड एग्जाम, JEE, NEET जैसे टेस्ट्स के समय छात्रों की मानसिक स्थिति सबसे नाजुक हो जाती है। अभिभावक सपने देखते हैं, लेकिन बच्चे दबाव में चूर हो जाते हैं।

  • NCRB डेटा बताता है कि 2013 में भारत में लगभग 8,423 छात्रों ने आत्महत्या की थी। 2023 में यह संख्या बढ़कर 13,892 हो गयी। कोटा जैसे कोचिंग सेंटर्स में ये आंकड़े दोगुने हैं।
  • भारत में छात्रों द्वारा होने वाली आत्महत्या की संख्या में एक दशक में लगभग 65% की वृद्धि देखी गई है। 2013 में कुल छात्र आत्महत्या 6.2% थी, वहीं 2023 में यह बढ़कर लगभग 8.1% हो गई। [The Times of India]
  • कई राज्यों से ऐसे मामले सामने आए हैं जहाँ बच्चों ने बोर्ड या प्रतियोगी परीक्षा के तनाव के बाद खुदकुशी जैसी स्थिति का सामना किया। उदाहरण के लिए, उत्तर प्रदेश में एक 15 वर्षीय कक्षा 10 की छात्रा ने अपने गणित परीक्षा के प्रदर्शन के तनाव के कारण आत्महत्या कर ली। [The Economic Times]

यह बढ़ोतरी सिर्फ आंकड़ों में नहीं दिखती- यह दिखाती है कि शिक्षा प्रणाली और सामाजिक दबाव का असर बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य पर कितना गहरा होता जा रहा है।

एग्जाम स्ट्रेस आखिर है क्या?

एग्जाम स्ट्रेस वह मानसिक दबाव है जो तब पैदा होता है जब बच्चा यह मानने लगता है कि- उसका मूल्य सिर्फ नंबरों से तय होगा, अब असफलता का मतलब सब कुछ खत्म, माता-पिता, समाज या शिक्षक निराश हो जाएँगे। यह स्ट्रेस धीरे-धीरे डर में बदलता है- डर चिंता बनता है- और चिंता चुप्पी बन जाती है।

सबसे खतरनाक बात यह है कि अधिकांश बच्चे इसे शब्दों में कह ही नहीं पाते। समस्या सिर्फ पढ़ाई नहीं – सोशल मीडिया तुलना, कोचिंग कॉम्पिटिशन और पैरेंटल एक्सपेक्टेशन्स मिलकर इसे विस्फोटक मिश्रण बनाते हैं।

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प्रमुख कारण: दिमाग पर हमला

आज के बच्चे पहले से ज़्यादा दबाव में क्यों हैं? यह प्रश्न हम सबके मन में आते हैं कि आज के बच्चे इतनी जल्दी हिम्मत क्यों हार जाते हैं। उसके कुछ कारण निम्न हैं –

1. असंभव अपेक्षाएँ

90% माता-पिता चाहते हैं कि बच्चा टॉप 100 में आए। “बेटा, तू डॉक्टर बनेगा” – ये प्रेशर 10 साल की उम्र से ही शुरू हो जाता है। इन सबके बीच बच्चा अपनी क्षमता भूल जाता है। कई बार माता-पिता कुछ कहते नहीं, लेकिन बच्चे सब समझ लेते हैं। “हमने तुम्हारे लिए इतना किया है” “हमारे घर का नाम तुम ही रोशन करोगे” ये वाक्य सीधे न कहे जाएँ, फिर भी बच्चों के दिमाग में गूँजते रहते हैं।

2. कोचिंग का जंगल

कोटा की कोचिंग में 16 घंटे पढ़ाई, और 2-3 घंटे नींद का समय होता है। इससे मानसिक तनाव बढ़ना स्वाभाविक है। IIT-कानपुर में 2023-26 तक 10 बच्चों ने  सुसाइड्स किया। कोचिंग में बच्चे मशीन बन जाते हैं, भावनाएँ दब जाती हैं। इसलिए गलत कदम उठ जाते हैं।

3. सोशल मीडिया तुलना

आज हर बच्चा सिर्फ अपने आप से नहीं, बल्कि टॉपर से, पड़ोसी के बच्चे से, सोशल मीडिया की “सफल कहानियों” से तुलना कर रहा है।बच्चा यह नहीं पूछता कि मैं क्या बनना चाहता हूँ, वह पूछता है- क्या मैं दूसरों जितना अच्छा हूँ? इंस्टाग्राम पर दोस्तों की रैंक देखकर डिप्रेशन में आ जाना। “सब पास हो गए, सिर्फ मैं फेल”- ये विचार घूमते रहते हैं।

4. असफलता का भय

हमारे समाज में फेल होना मतलब नाकामी, और दोबारा कोशिश करना कमजोरी मानी जाती है, जबकि सच्चाई यह है कि असफलता सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा होता है। एक फेल पेपर- मतलब जीवन फेल ? बच्चा सोचता है, “मैं बेकार हूँ”। सेल्फ-वर्थ रिजेक्ट मोड में चला जाता है। और वो इससे बचने का तरीका खोजने लगता है।

ये आदत धीरे-धीरे डिप्रेशन की ओर ले जाती है !

5. नींद-खान-पान की कमी

पर्याप्त पौष्टिक भोजन न मिलना और नींद की कमी, शरीर के साथ दिमाग पर भी असर डालती है। 18 घंटे तक पढ़ाई करने से बच्चे का इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) बढ़ता है, जो चिंता को दोगुना करता है।

6. बच्चों की भावनाओं को न समझना

जब बच्चा कहता है- “मुझे डर लग रहा है” “मुझसे ये नहीं हो पा रहा” तो पेरेंट्स से जवाब मिलता है- “बहाने मत बनाओ” “हमारे जमाने में तो. .” “ड्रामा करने की जरुरत नहीं है”। बस यहीं से बच्चा चुप होना सीखता है।

खतरे के संकेत: तुरंत पहचानें

हर बच्चा रोकर नहीं बताता कि वह परेशान है। कई बच्चे शांत होकर टूटते हैं। कुछ संकेत हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए:

  • अचानक चुप्पी: बातचीत कम, अकेले रहना।
  • नींद उड़ी: रात 3-4 बजे तक जागना, सुबह थकान।
  • गुस्सा फूटना: छोटी छोटी बात पर झल्लाना।
  • खाना छोड़ना: भूख न लगना या ज्यादा खाना।
  • पढ़ाई से डरना या बचना
  • बार-बार पेट दर्द, सिर दर्द
  • अजीब सर्च: “जीवन व्यर्थ क्यों?” जैसे गूगल सर्च।

ये संकेत 72 घंटे में नोटिस करें। ये मदद की माँग हैं, ज़िद नहीं। 80% मामलों में जल्दी हस्तक्षेप जान बचा लेता है।

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क्या सिर्फ पढ़ाई ही वजह है?

एग्जाम स्ट्रेस अक्सर ट्रिगर होता है, असली वजह केवल पढाई ही नहीं होती। असल कारण हो सकते हैं: घर का माहौल, माता-पिता का तनाव, पहले की असफलता, आत्मविश्वास की कमी, भावनात्मक सहारा न मिलना आदि। जब ये सब मिलते हैं, तो एग्जाम आख़िरी दबाव बन जाता है।

1. परिवारिक कलह (30% केस)

  • माता-पिता के झगड़े, तलाक या अलगाव की स्थिति।
  • भाई-बहन से कॉन्फ्लिक्ट या लड़ाई झगड़े।
  • शराब/ड्रग्स का परिवारिक इतिहास।

2. आर्थिक दबाव (25% केस)

  • कोचिंग फीस (कोटा: ₹5-10 लाख/साल), लोन चुकाने का तनाव।
  • गरीब परिवारों में “डॉक्टर बनो, परिवार उबारो” प्रेशर।
  • फसल न होना/खेत बेचना/बेरोजगारी से पैरेंट्स का फ्रस्ट्रेशन बच्चे पर।

3. सोशल फैक्टर्स (20% केस)

  • मोहल्ले में हिंसा, गरीबी का कलंक, हीन भावना।
  • सिंगल-पैरेंट घर होना।
  • मेंटल हेल्थ के प्रति फैमिली में हिस्ट्री।

आंकड़े बताते हैं कि (2022 NCRB) छात्रों में सुसाइड का 25%-30% कारण ‘पारिवारिक समस्यायों’ से है, परीक्षा में फेल होने से सिर्फ 11% है। कोटा में 45% सुसाइड मामलों में आर्थिक/फैमिली मुद्दे मुख्य थे।

नींद की कमी और मानसिक तनाव के बीच सीधा सम्बन्ध

मध्यमवर्गीय परिवार और एजुकेशन

आज बहुत से बच्चे सिर्फ किताबों का बोझ नहीं उठा रहे, वे घर की आर्थिक चिंता भी अपने कंधों पर ढो रहे हैं। जब कोई बच्चा जानता है कि उसकी पढ़ाई के लिए लोन लिया गया है, परिवार ने बचत तोड़ दी है, माँ-बाप ने अपनी ज़रूरतें पीछे रख दी हैं तो उसके दिमाग में पढ़ाई सपना नहीं, कर्ज़ चुकाने की ज़िम्मेदारी बन जाती है।

exam stress in students

“अगर मैं फेल हो गया तो?”- यह डर सबसे खतरनाक होता है। ऐसे बच्चों के मन में सवाल चलते रहते हैं: अगर नंबर कम आए तो लोन कैसे चुकाया जाएगा? क्या मैं अपने माता-पिता की उम्मीदों पर खरा उतर पाऊँगा?

मेरी वजह से घर पर बोझ तो नहीं बढ़ रहा? यह सोच धीरे-धीरे अपराधबोध, आत्मग्लानि और खुद को “बोझ” समझने की भावना पैदा कर देती है।

एजुकेशन लोन कई बच्चों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता होता है, लेकिन सही संवाद न हो तो वही लोन भय का कारण बन जाता है। समस्या लोन नहीं है, समस्या है- लोन को “आखिरी मौका” बना देना, यह जताना कि “अब गलती की गुंजाइश नहीं”

एग्जाम स्ट्रेस से बचाने के 8 जीवन रक्षक उपाय

बच्चों को बचाने का मतलब सिर्फ पढ़ाई में मदद करना नहीं है। असल में यह उनके मन को सुरक्षित महसूस कराना है ताकि वे डर, दबाव और अकेलेपन में खुद से जूझते न रहें।

1. 10 मिनट “बिना जजमेंट” बातचीत

अधिकांश बच्चे यह मानने लगते हैं कि “मेरी पहचान मेरे नंबर हैं।” यही सोच उन्हें अंदर से तोड़ती है। बार-बार स्पष्ट शब्दों में कहें- “तू रिज़ल्ट नहीं, हमारा बच्चा है।” जब बच्चे को बिना किसी शर्त के स्वीकार्यता मिलती है, तो वह दबाव में भी सुरक्षित महसूस करता है।

दिन में 10 मिनट बच्चे से खुलकर बात करें। बच्चे को जोर से गले लगायें और उससे कहें – “तू अकेला नहीं। मैं हूँ ना।” इस बात को दोहरायें – “सब ठीक हो जाएगा। तू चिंता मत कर, हम साथ हैं।” इतना सहारा उसके मनोबल को बचाने के लिए काफी है।

2. तुलना बंद करें

तुलना पूरी तरह बंद करें – यह सबसे ज़हरीली आदत है, “फलाँ के इतने नंबर आए” “उसका बेटा तो टॉपर है” ये वाक्य बच्चे को यह सिखाते हैं कि “मैं कभी पर्याप्त नहीं हूँ।” बच्चे की तुलना सिर्फ उसके अपने पिछले प्रदर्शन से करें, प्रयास की तारीफ करें, सिर्फ परिणाम की नहीं, तुलना से प्रेरणा नहीं, हीनता पैदा होती है।

आपको तुलना करते देख बच्चे भी यही करने लगते हैं और फिर आपको पता नहीं चलता की वो कब डेप्रेशन में चले गए।

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3. पैसों और लोन की चिंता बच्चे पर न डालें

जब बच्चा जानता है कि पढ़ाई के लिए लोन लिया गया है, घर की आर्थिक हालत कमजोर है तो वह हर गलती को “पाप” समझने लगता है।उससे साफ कहें: “पैसे की चिंता हमारी है, तुम्हारी नहीं।” कभी यह न जताएँ कि “तेरी वजह से इतना खर्च हुआ है।”

आर्थिक दबाव + परीक्षा का डर, यह सबसे खतरनाक कॉम्बिनेशन है। बच्चे को साफ बताइए- “पढ़ाई तुम्हारी जिम्मेदारी है, पैसे की चिंता हमारी।” यह एक लाइन उसके मन से बहुत बड़ा बोझ हटा सकती है।

4. असफलता को सामान्य बनाइए, डरावना नहीं

अगर बच्चा यह सोचता है कि “फेल हुआ तो सब खत्म” तो वह मानसिक रूप से फँस जाता है। अपनी असफलताओं की कहानियाँ उसके साथ साझा करें, बताएं कि रास्ते एक से ज़्यादा होते हैं, दोबारा कोशिश को सम्मान दें। संदेश साफ होना चाहिए- असफलता अंत नहीं, एक मोड़ है। हर सफल व्यक्ति एक नहीं, अनेकों बार असफल हुआ है।

5. बच्चों के संकेतों को हल्के में न लें

बच्चे हमेशा सीधे नहीं कहते कि वे परेशान हैं। चेतावनी संकेत- अचानक चुप रहना, नींद में बदलाव,  चिड़चिड़ापन या उदासी, खुद को बेकार कहना। इन संकेतों को “नखरे” न कहें, समय रहते बातचीत शुरू करें।

जब बच्चा कहे “मुझसे नहीं हो पा रहा” “डर लग रहा है” तो हमारा पहला रिएक्शन होता है- सलाह देना, तुलना करना, डाँटना- लेकिन बच्चे को उस पल सलाह नहीं, समझ चाहिए। शांत होकर उसे सुनें, बीच में न टोकें, सुने जाने से बच्चे का दिमाग “लड़ो या भागो” मोड से बाहर  आता है।

6. पढ़ाई के अलावा भी ज़िंदगी है

यह दिखाइए, अगर बच्चा दिन-रात सिर्फ किताब, कोचिंग, टेस्ट में उलझा रहेगा, तो उसका दिमाग थक जाएगा। रोज़ थोड़ा वक़्त खेल, संगीत, बातचीत, आराम के लिए रखें। उसे हफ्ते में एक दिन कहीं बाहर आउटिंग के लिए ले जाएँ या भेजें। प्रकृति के बीच मूड बदल जाता है। थका हुआ दिमाग कभी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पाता।

पढाई या एग्जाम के दौरान बच्चे के स्वस्थ और पौष्टिक खाने पीने और सोने के समय पर विशेष ध्यान रखें।

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7. मदद लेना कमजोरी नहीं, समझदारी है

अगर बच्चा बहुत ज़्यादा डरा हुआ है, खुद को नुकसान पहुँचाने की बात करता है, बिल्कुल चुप हो गया है तो केवल परिवार की कोशिश काफी नहीं होगी। स्कूल काउंसलर, मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ, भरोसेमंद शिक्षक से समय पर बात करें। याद रखें- डॉक्टर के पास जाना बीमारी की हार नहीं, इलाज की शुरुआत है।

8. बच्चे को अकेला महसूस न होने दें

बच्चे को हर हाल में यह महसूस होना चाहिए “मैं अकेला नहीं हूँ।” एक भरोसेमंद रिश्ता कभी-कभी किसी भी थेरेपी से ज़्यादा असरदार होता है। बच्चों को बचाने के लिए हमें उनके दिमाग को बदलने से पहले अपनी सोच बदलनी होगी।

अगर हम सुनना सीख लें, दबाव कम करें और बिना शर्त साथ दें तो बहुत से बच्चे टूटने से बच सकते हैं। शिक्षकों और स्कूलों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है। अगर स्कूल सिर्फ टॉपर नहीं, हर बच्चे को सुने, डर की जगह भरोसा दे, रिज़ल्ट से पहले इंसान देखे, तो बहुत से बच्चे टूटने से बच सकते हैं।

कोटा मॉडल: क्या बदलाव लाए?

2025 में कोटा ने सुसाइड रोकथाम के लिए कुछ ठोस कदम उठाये –
– 24/7 काउंसलिंग शुरू की गयी
– 8 घंटे नींद को अनिवार्य किया गया
– पैरेंट्स टीचर मीटिंग हर 15 दिन में

परिणाम: सुसाइड में 40% की कमी आयी। हर कोचिंग सेंटर इसे कॉपी करे तो कुछ फर्क पड़ सकता है।

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1. तुलना न करें: “देख तेरा दोस्त 95% लाया।”
2. रिजल्ट = लक्ष्य न बनाएँ: “पास हुआ तो पार्टी देंगें।”
3. खुद की असफलता न थोपें: “मैं फेल हुआ, अब तू मत होना।”
4. सोशल मीडिया न दिखाएँ: “देख इंस्टा पर सब पास हैं।”
5. जबरदस्ती न पढ़ाएँ: 18 घंटे पड़ने से ब्रेकडाउन होगा।

बच्चों के लिए एक ज़रूरी बात

अगर यह ब्लॉग कोई बच्चा पढ़ रहा है, तो उसके लिए- “तुम्हारी कीमत तुम्हारे नंबर नहीं तय करते। एक परीक्षा तुम्हारी पूरी कहानी नहीं लिख सकती।  बात करना, मदद माँगना, रुकना, विकल्प देखना – सब ठीक है।”

निष्कर्ष

एग्जाम स्ट्रेस कोई छोटा मुद्दा नहीं है। यह बच्चों की मानसिक सेहत,उनके आत्मविश्वास और कभी-कभी उनकी ज़िंदगी से जुड़ा है। बचाव का सबसे बड़ा तरीका है – समय पर समझना, और बिना जज किए साथ देना। अगर आपको लगे कि कोई बच्चा बहुत ज़्यादा दबाव में है, तो उसे अकेला न छोड़ें। बात करना, सुनना और मदद लेना- यही सबसे बड़ा बचाव है।

जब हम सिर्फ टॉपर्स को नहीं, हर कोशिश को सम्मान देंगे, असफलता को सीख मानेंगे, बच्चों की भावनाओं को गंभीरता से लेंगे तभी एग्जाम का डर धीरे-धीरे कम होगा। सुसाइड के मामलों में कमी आएगी।

14,000 की संख्या सिर्फ आंकड़े नहीं, ये हमारे बच्चे हैं। आज उपाय अपनाएँ, कल जीवन बचाएँ। इस ब्लॉग को ज्यादा से ज्यादा शेयर करें, बच्चों का जीवन बचाएं। कमेंट में अपने अनुभव बताएँ। हेल्पलाइन याद रखें: 104।

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