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हम दूसरों को दी गयी सलाह खुद पर लागू क्यों नहीं करते?

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हम दूसरों को दी गयी सलाह खुद पर लागू क्यों नहीं करते?

Why we ignore our own Adviceआपने कभी सोचा है कि हम दोस्तों को कितनी शानदार सलाह देते हैं? जैसे, “भाई, जिम जाओ, वेट कम करो!” या “तनाव मत लो, मेडिटेशन करो!” लेकिन जब अपनी बारी आती है, तो वही सलाह भूल जाते हैं।

हम अक्सर मज़ाक में कहते हैं, “दूसरों को सलाह देना तो आसान है, खुद पर लागू करना सबसे मुश्किल।” लेकिन अगर गहराई से देखें, तो यह मज़ाक नहीं बल्कि इंसानी दिमाग की एक बहुत बड़ी सच्चाई है।

लगभग हर इंसान ने जीवन में कभी न कभी यह महसूस किया है कि उसे ठीक-ठीक पता है कि सही क्या है, फिर भी वह वही काम नहीं कर पाता। किसी दोस्त का रिश्ता बिगड़ रहा हो तो हम पूरे आत्मविश्वास के साथ उसे समझाते हैं कि संवाद ज़रूरी है, धैर्य रखना चाहिए और भावनाओं को खुलकर कहना चाहिए।

लेकिन जब वही स्थिति हमारे जीवन में आती है, तो हम चुप रह जाते हैं, उलझते रहते हैं और कई बार वही गलतियाँ दोहराते हैं जिनसे बचने की सलाह हम दूसरों को देते रहे हैं। क्यों होता है ऐसा? क्या हम दोहरे चरित्र वाले हैं? आज हम इसी पर बात करेंगे- पूरी तरह मनोवैज्ञानिक नजरिए से।

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सलाह देने में मजा, खुद पर अमल में दिक्कत?

सबसे पहले ये समझें कि सलाह देना कितना आसान होता है- जब हम किसी और को सलाह देते हैं, तो हम ‘आउटसाइडर’ की तरह सोचते हैं। जैसे कोई फिल्म देख रहे हों। समस्या साफ दिखती है – “ये तो बिल्कुल सिम्पल है, बस ये कर लो!” लेकिन खुद की जिंदगी में उतरते ही सब उल्टा हो जाता है। क्यों? क्योंकि अब हम ‘इनसाइडर’ बन जाते हैं। अपनी आदतें, भावनाएं, डर सब बीच में आ जाते हैं।

हम जब किसी और की समस्या सुनते हैं, तब हम उसके भीतर नहीं फँसे होते। हमारे ऊपर उस फैसले का बोझ नहीं होता, न डर हमारा होता है, न परिणाम हमारे सिर पर लटक रहा होता है। इसलिए हमारी सोच साफ़ रहती है। हम पूरे आत्मविश्वास के साथ कह पाते हैं कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं। यह दूरी हमें तर्कसंगत बना देती है। दिमाग उस समय भावनाओं से नहीं, समझ से काम करता है। इसी कारण दूसरों की उलझनें हमें अक्सर सरल लगती हैं और हम उन्हें सुलझाने की कोशिश भी बड़ी सहजता से कर लेते हैं।

मनोविज्ञानी इसे ‘सलाह का विरोधाभास’ कहते हैं। एक रिसर्च में पाया गया कि लोग दूसरों के लिए 80% सलाह सही मानते हैं, लेकिन खुद के लिए सिर्फ 40% ही अपनाते हैं। चलिए इसका कारण समझते हैं –

1. संज्ञानात्मक पूर्वाग्रह (Cognitive Biases)

हमारा दिमाग चालाक है मित्रों। वो हमेशा खुद को बचाने के shortcut लेता है। इन्हें कॉग्निटिव बायस कहते हैं। सबसे बड़ा वाला है आशावादी पूर्वाग्रह। हम सोचते हैं, “दूसरों के साथ तो प्रॉब्लम होगी, लेकिन मेरे साथ तो सब ठीक हो जाएगा।” जैसे सिगरेट पीने वाला कहता है, “दूसरों को कैंसर होता है, मुझे क्या?”

कन्फर्मेशन बायस: हम वही सुनते-मानते हैं जो हमारी पुरानी सोच से मैच करे। सलाह मिले “डाइटिंग करो”, लेकिन हम सोचेंगे “अरे, एक चॉकलेट तो बिगाड़ नहीं लेगी।”
सेल्फ-सर्विंग बायस: अपनी गलतियां भाग्य पर डाल देते हैं, और सफलता खुद के श्रेय। “मैंने डाइट तो फॉलो की, लेकिन वजन नहीं घटा- ये जीन का दोष है!” “ये थायरॉयड की वजह से है”

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2. भावनात्मक दूरी (Emotional Distance)

सलाह देते वक्त हम इमोशनल दूरी पर होते हैं लेकिन जब खुद पर लागू करो तो इमोशंस घुस आते हैं- डर, आलस, शर्म। मतलब, समस्या से दूरी होने पर हम सही देख पाते हैं, नज़दीकी होने पर हम उसमें उलझ जाते हैं।

psychologist Daniel Kahneman की किताब Thinking, Fast and Slow में बताया है कि हमारा दिमाग दो सिस्टम पर चलता है। सिस्टम 1- फास्ट, भावनात्मक। सिस्टम 2- स्लो, तार्किक। सलाह देने में सिस्टम 2 एक्टिव होता है लेकिन खुद पर अमल में सिस्टम 1 हावी हो जाता है। “अभी जिम जाऊंगा? बाहर बारिश है ना!”

एक स्टडी में लोगो को पैसे देकर सलाह फॉलो करने को कहा गया। बिना पैसे के सिर्फ 20% फॉलो करते हैं, पैसे के साथ 70% लोग। मतलब, इमोशनल बैरियर को इनाम से तोड़ सकते हैं। लेकिन रोजमर्रा में कौन पैसे देगा खुद को?

3. आदतों की जंजीरें (Habit Loops)

आदतें तोड़ना कितना मुश्किल होता है! Charles Duhigg की The Power of Habit में हैबिट लूप बताया है- Cue (ट्रिगर), Routine (क्रिया), Reward (इनाम)। सलाह नई रूटीन सुझाती है, लेकिन हम पुरानी लूप तोड़ना भूल जाते हैं।

जैसे, कहा जाता है “सुबह योग करो।” लेकिन सुबह का ट्रिगर है चाय पीना। पुरानी रूटीन चाय-अखबार बनी रहती है। नई डालो तो तुरंत रिवार्ड नहीं मिलता। दिमाग कहता है, “पुरानी ही ठीक है।” सलाह देना हमें भीतर से मज़बूत महसूस कराता है। इससे हमें लगता है कि हम समझदार हैं, अनुभवी हैं और किसी के काम आ रहे हैं।

लेकिन जब वही सलाह खुद पर लागू करने की बात आती है, तो आदतें, डर और अहंकार सामने आ खड़े होते हैं। तब मन कहता है कि बदलाव जोखिम भरा है, जो चल रहा है उसे ही चलने दो। ज्ञान होते हुए भी आदतें जीत जाती हैं, और हम वही करते रहते हैं जिसे हम गलत मानते हैं।

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4. आत्म-करुणा की कमी (Lack of Self-Compassion)

हम दूसरों पर दया करते हैं, खुद पर जजमेंटल हो जाते हैं। Kristin Neff की थ्योरी है- हम सोचते हैं, “अगर मैं फेल हुआ तो लूजर बन जाऊंगा।” इसलिए रिस्क नहीं लेते। एक और दिलचस्प बात यह है कि हम कई बार खुद से ज़्यादा भरोसा दूसरों पर कर लेते हैं। हमें लगता है कि हम पक्षपाती हैं, हमारी सोच भावनाओं से भरी हुई है, इसलिए शायद हम सही फैसला नहीं ले पाएँगे।

वहीं दूसरों के मामले में हमें लगता है कि हम निष्पक्ष हैं, समझदार हैं और सही सलाह दे सकते हैं। यही कारण है कि हम अपने निर्णयों को बार-बार टालते रहते हैं, लेकिन दूसरों को तुरंत रास्ता दिखा देते हैं। दूसरे को कहते हैं “ट्राय करो, फेल होगे तो क्या!” खुद के लिए “फेल हुआ तो सब हंसेंगे।” ये परफेक्शनिज्म है। रिसर्च दिखाता है कि सेल्फ-कॉम्पैशन वाले लोग 30% ज्यादा सलाह फॉलो करते हैं।

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5. वर्तमान पूर्वाग्रह (Present Bias)

यह एक मनोवैज्ञानिक व्यवहार है जहाँ लोग आज मिलने वाले छोटे इनाम को भविष्य में मिलने वाले बड़े इनाम से ज्यादा पसंद करते हैं। इसे हायपरबोलिक डिस्काउंटिंग कहते हैं। आज का सुख कल के दुख से ज्यादा कीमती लगता है। “आज चॉकलेट खा लूं, कल से डाइट।” कल फिर वही। Economist George Ainslie की थ्योरी- हमारा दिमाग भविष्य को कम वैल्यू देता है।

सलाह तो फ्यूचर बेनिफिट पर देते हैं, लेकिन अमल वर्तमान के मूल्य पर अटकता है। दोस्त को बोलो “डाइट शुरू करो”, खुद रात को पिज्जा ऑर्डर कर देते हो। क्यों? आज का स्वाद बड़ा है कल का वजन छोटा। “सुबह जिम जाऊंगा” सोचते हो, लेकिन बेड पर लेटे रहते हो। कल का फिट बॉडी कम वैल्यू लगता।

6. अधिक चिंतन का जाल (Overthinking)

इस सबके बीच ओवरथिंकिंग आग में घी डालने का काम करती है। हम अपनी ही समस्याओं को इतना सोचते हैं कि सोच ही हमारे एक्शन को निगल जाती है। हम हर पहलू पर विचार करते रहते हैं, हर संभावित नतीजे को तौलते रहते हैं और अंत में कुछ भी नहीं कर पाते। यही कारण है कि कई बार ज़िंदगी जीते-जी ही निकल जाती है और हम कहते रह जाते हैं कि सोचा तो बहुत था, किया कुछ नहीं।

दोस्त को समझाते समय हम कहते हैं कि हर फैसले पर ज़रूरत से ज़्यादा सोचना नुकसानदेह है और कभी-कभी कदम उठाना ज़रूरी होता है। लेकिन खुद के मामले में हम हर “अगर” और “मगर” पर अटक जाते हैं। सोच इतनी बढ़ जाती है कि फैसला लेने से पहले ही हम थक जाते हैं और कुछ भी नहीं कर पाते।

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7. डर की सीमा (Fear Limits)

डर शायद सबसे बड़ा कारण है, जिसकी वजह से हम अपनी सलाह खुद पर नहीं लागू कर पाते। असफल होने का डर, गलत फैसला लेने का डर, लोगों की राय का डर और अकेले पड़ जाने का डर, हमें रोक देता है। दूसरों को सलाह देते समय ये डर हमारे नहीं होते, इसलिए हम निडर होकर बोल पाते हैं। लेकिन अपने जीवन में वही साहस दिखाना मुश्किल हो जाता है।

जब कोई दोस्त टूटते रिश्ते में फँसा होता है, तो हम पूरे भरोसे से कहते हैं कि मानसिक शांति सबसे ज़रूरी है और गलत रिश्ते से बाहर निकलना ही सही फैसला है। लेकिन जब वही स्थिति हमारी अपनी ज़िंदगी में आती है, तो डर हमें रोक लेता है। अकेले रह जाने का डर, लोगों की राय का डर और भविष्य की अनिश्चितता हमारी ही सलाह को हमसे दूर कर देती है।

क्या इसका मतलब हम कमजोर हैं?

नहीं बिलकुल नहीं – इसका मतलब यह नहीं है कि हम कमजोर हैं। इसका मतलब यह है कि हम इंसान हैं। जो व्यक्ति दूसरों को गहराई से समझ पाता है और अच्छी सलाह दे सकता है, उसके भीतर संवेदनशीलता और समझ दोनों होती हैं। बस वही समझ जब खुद पर लागू करने की बात आती है, तो डर और आदतें बीच में आ जाती हैं।

तो समाधान क्या है?

इसके लिए खुद से दुश्मन जैसा व्यवहार छोड़ना होगा। हमें खुद से वैसे ही बात करनी होगी जैसे हम किसी अपने से करते हैं- समझदारी और नरमी के साथ। परफेक्ट बनने की जगह छोटे कदमों पर भरोसा करना होगा। अपनी भावनाओं को दबाने के बजाय उन्हें समझना होगा और स्वीकार करना होगा कि डर होना इंसानी है।

जिस दिन हम खुद के साथ भी वही करुणा बरतना सीख लेंगे, उसी दिन हमारी सलाह सिर्फ शब्द नहीं रहेगी, बल्कि हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएगी। अब सॉल्यूशन। सिर्फ समझना काफी नहीं, अमल करो।

प्रैक्टिकल टिप्स

1. खुद से दूरी: खुद को तीसरे व्यक्ति की तरह देखो। “राहुल को क्या सलाह दोगे?” वैसे ही खुद को दो।
2. छोटी आदतें: बड़ा बदलाव मत करो। “5 मिनट योग” “दिन में दो चाय कम” से शुरू करो।
3. जिम्मेदार पार्टनर: अपने किसी दोस्त या करीबी को बताओ। वो तुहें रिमाइंड करेगा।
4. इनाम का सिस्टम: अपनी सलाहों के अमल पर खुद को ट्रीट दो। अच्छी आदत पर कोई छोटा सा इनाम।
5. डायरी/जर्नलिंग: रोज डायरी लिखो- आज क्या सलाह फॉलो की? उससे कैसा लगा ?
6. माइंडफुलनेस: प्रतिदिन 10 मिनट मेडिटेशन/ध्यान लगाने से पूर्वाग्रह कम होंगे।

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आख़िरी और सबसे ज़रूरी बात- अगर आप दूसरों को अच्छी सलाह दे पाते हैं, तो इसका मतलब है कि आपके अंदर समझ है। अब ज़रूरत है- खुद से थोड़ा धैर्य, थोड़ा करुणा और थोड़ा साहस दिखने की।

याद रखिए- “जो दूसरों के लिए रोशनी बन सकता है, वह अपने लिए अंधेरा नहीं हो सकता, बस उसे खुद पर भी वही रोशनी डालनी होती है।” एक सर्वे में 70% भारतीय मानते हैं कि सलाह खुद पर अमल नहीं करते। क्यों? फैमिली प्रेशर, काम का स्ट्रेस वगैरह वगैरह। लेकिन योग, प्राणायाम जैसे ट्रेडिशनल तरीके इसमें हेल्प करते हैं।

निष्कर्ष: खुद से दोस्ती करो

आख़िर में यही कहा जा सकता है कि अगर हम दूसरों के लिए सही शब्द ढूँढ सकते हैं, सही रास्ता दिखा सकते हैं, तो वही क्षमता हमारे अंदर अपने लिए भी मौजूद है। फर्क सिर्फ इतना है कि दूसरों के लिए हम दयालु होते हैं और खुद के लिए कठोर। जिस दिन हम खुद के साथ भी वही नरमी और समझदारी अपनाना सीख लेंगे, उसी दिन हमारी सलाह सच में हमारे जीवन का हिस्सा बन जाएगी।

हम अपनी सलाह इसलिए नहीं अपनाते क्योंकि दिमाग, इमोशंस, आदतें बाधा डालती हैं। लेकिन समझ आए तो बदलाव संभव है। आज से शुरू करो- एक छोटी सलाह चुनो। खुद को कोसो मत, अपनी कोशिश को सराहो। न्यूरोप्लास्टिसिटी (दिमाग का लचीलापन) तुम्हारे साथ है। रिवायर योर सोच!

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https://www.thecut.com/2015/06/why-is-it-hard-to-take-your-own-advice.html

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