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जिस चीज को हम पा लेते हैं, उससे मोहभंग क्यों हो जाता है?

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जिस चीज को हम पा लेते हैं, उससे मोहभंग क्यों हो जाता है?

हेडॉनिक एडाप्टेशन

क्या आपने कभी सोचा है कि बचपन में जो खिलौना या गैजेट आपको सबसे ज्यादा पसंद था, वो मिलने के बाद जल्दी ही बोरिंग हो गया? या फिर वो रिश्ता, नौकरी या संपत्ति जो सालों की चाहत थी, हासिल होते ही वैसी रोमांचक न लगे?

जो चीज़ कभी सपनों में चमकती थी, वही अचानक साधारण लगने लगती है। ये कोई संयोग नहीं है। ये मोहभंग का खेल है- जब हम कुछ पा लेते हैं, तो उसका आकर्षण फीका पड़ जाता है।

पर सवाल ये है: क्या हम कृतघ्न हैं? या हमारा दिमाग ही ऐसा बना है? इसका जवाब छिपा है गहरी मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया में। इस ब्लॉग में हम समझेंगे कि ऐसा क्यों होता है। साथ ही, इससे बचने के आसान उपाय भी बताएंगे। अगर आप अपनी जिंदगी को ज्यादा खुशहाल बनाना चाहते हैं, तो अंत तक पढ़ें। चलिए शुरू करते हैं!

मोहभंग क्या है? एक सरल परिभाषा

सबसे पहले समझें मोहभंग को। हिंदी में ‘मोह’ मतलब आसक्ति या लगाव, और ‘भंग’ मतलब टूटना। यानी, जिस चीज के प्रति हमारा गहरा मोह था, वो मिलने पर मोह टूट जाता है। अंग्रेजी में इसे Hedonic Treadmill या Hedonic Adaptation कहते हैं। मान लीजिए आप नई स्मार्टफोन खरीदते हैं। पहले दिन तो आप घंटों उसकी स्क्रीन छूते रहते हैं- कैमरा कमाल का, स्पीड तेज! लेकिन एक-दो हफ्ते बाद? वो पुरानी फोन जैसी ही लगने लगती है। ये मोहभंग है।

विज्ञान क्या कहता है? हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिक डैनियल काह्नेमैन ने बताया कि इंसान की खुशी दो तरह की होती है:
उत्तेजना वाली खुशी (Peak Pleasure): नई चीज मिलने पर।
स्थिर खुशी (Sustained Happiness): जो लंबे समय तक बनी रहे। ज्यादातर चीजें पहली वाली खुशी देती हैं, जो जल्दी खत्म हो जाती है।

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क्यों होता है मोहभंग? मुख्य कारण

अब आते हैं असली सवाल पर- ऐसा क्यों होता है? इसके 7 प्रमुख कारण हैं। इन्हें समझकर आप अपनी सोच बदल सकते हैं।

1. दिमाग खुशी नहीं, आदत का मशीन है (हेडॉनिक एडाप्टेशन)

मनोविज्ञान कहता है कि इंसान का दिमाग किसी भी खुशी का आदी हो जाता है। ये दिमाग के लचीलेपन का कमाल है। शुरुआत में नई चीज़ मिलने पर दिमाग में डोपामाइन नाम का हार्मोन निकलता है- जो खुशी का रसायन है। लेकिन जल्दी ही दिमाग इसे ‘सामान्य’ मान लेता है।
इसे कहते हैं: हेडॉनिक एडाप्टेशन (Hedonic Adaptation) यानी खुशी का जल्दी ही साधारण बन जाना।

आज का सपना कल की दिनचर्या बन जाता है। इसीलिए: नया फोन- 7 दिन में पुराना, नई कार- कुछ हफ्तों में सामान्य, नया रिश्ता- कुछ महीनों में रोजमर्रा की बात लगने लगता है। यहाँ चीज़ नहीं बदलती बल्कि हमारा न्यूरोकेमिकल रिस्पॉन्स बदल जाता है।

2. अपेक्षाओं का जाल

जब तक कोई चीज़ दूर होती है, हमारा दिमाग उसे परफेक्ट बनाकर दिखाता है। हकीकत में वो उतना परफेक्ट नहीं होता। हम प्यार व्यक्ति से नहीं करते, हम प्यार करते हैं उसकी कल्पना (Fantasy) से। पाने से पहले दिमाग कहता है: “अगर ये मिल गया तो ज़िंदगी पूरी हो जाएगी।” लेकिन पाने के बाद वास्तविकता सामने आती है- कमियाँ, सीमाएँ, इंसानी कमजोरियाँ।

तब दिमाग को झटका लगता है। यही अंतर मोहभंग पैदा करता है। इसे एंकरिंग बायस कहते हैं- हमारी अपेक्षाएं ऊंची हो जाती हैं।उदाहरण: शादी से पहले पार्टनर को ‘परफेक्ट’ सोचते हैं। शादी के बाद उसकी छोटी-छोटी आदतें खटकने लगती हैं। मोहभंग हो गया!

3. कमी का आकर्षण (Scarcity Principle)

अक्सर हम किसी चीज़ को इसलिए नहीं चाहते क्योंकि हमें वह चीज़ पसंद है, बल्कि इसलिए क्योंकि वह हमारे अंदर की कमी को भरती है।जैसे: रिश्ता- अकेलापन भरने के लिए चाहिए होता है। पैसा- असुरक्षा मिटाने के लिए और सफलता- खुद को साबित करने के लिए चाहिए होती है। लेकिन समस्या यह है: ये बाहरी चीज़ें अंदर की खाली जगह को स्थायी रूप से नहीं भर सकतीं। इसलिए मिलने के बाद भी भीतर वही अधूरापन बचा रहता है- और वहीं से मोहभंग शुरू होता है।

जो दुर्लभ है, वो कीमती लगता है। मिलने पर वो आम हो जाता है। रॉबर्ट चाल्डिनी की किताब ‘Influence’ में लिखा है- कमी से डिमांड बढ़ती है। उदाहरण: सिंगल होने पर डेटिंग रोमांचक लगती है। लेकिन रिलेशनशिप में आने पर वह रूटीन हो जाती है।

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हेडॉनिक एडाप्टेशन

4. दिमाग की वायरिंग (Evolutionary Reason)

पुराने समय में इंसान को नई चीजें ढूंढनी पड़ती थीं। उनका मुख्य लक्ष्य था – भोजन ढूंढना, शिकार करना, खतरे से बचना और संतान पैदा करना। जो लोग मिली हुई चीजों से संतुष्ट हो जाते, वे पीछे रह जाते। इसलिए विकास ने ऐसी ‘वायरिंग’ बनाई जो हमें हमेशा नया ढूंढने को मजबूर करे, जो मिल गया, उससे संतुष्टि न हो तो नया ढूंढो। ये सर्वाइवल इंस्टिंक्ट है जो विकास (Evolution) ने हमें दिया है।

दिमाग का रिवॉर्ड सिस्टम (Dopamine) नई चीजों पर एक्टिवेट होता है। मिलने पर खुशी मिलती है, लेकिन जल्दी ‘आम’ हो जाता है ताकि नया सर्च जारी रहे। इसलिए हमारा दिमाग आज भी मिली चीज से जल्दी बोर हो जाता है। डोपामाइन हार्मोन नया सर्च करवाता है। ये हमें बेचैन रखता है- नई कार, नया प्यार, नई जॉब का चक्कर! यही कारण है कि स्थिर सुख हमें नहीं, बदलता रोमांच हमें आकर्षित करता है।

5. संघर्ष में उत्साह, स्थिरता में बोरियत

दिमाग को सबसे ज़्यादा मज़ा पाने की प्रक्रिया में आता है, पाने में नहीं। जब हम किसी लक्ष्य, रिश्ते या सपने के लिए संघर्ष कर रहे होते हैं, उस समय हमारे मस्तिष्क में डोपामिन नामक हार्मोन तेज़ी से निकलता है, जो कि चाहत और उत्साह का रसायन है। यह तब निकलता है जब हमें कुछ पाने की उम्मीद होती है, जब चीज़ अनिश्चित होती है और भविष्य को लेकर रोमांच बना रहता है- उम्मीद, कल्पना और इंतज़ार मिलकर दिमाग को लगातार उत्तेजित करते रहते हैं।

लेकिन जैसे ही वही लक्ष्य मिल जाता है, अनिश्चितता खत्म हो जाती है और दिमाग का रोमांच भी ठंडा पड़ने लगता है। अब डोपामिन का स्तर गिर जाता है, क्योंकि दिमाग के पास उत्तेजित होने के लिए कुछ नया नहीं बचता। तब हमें लगने लगता है कि “अब इसमें मज़ा नहीं रहा”, यही कारण है कि नया रिश्ता, नई नौकरी या नया सपना कुछ समय बाद साधारण लगने लगता है, क्योंकि हमारा दिमाग पाने की प्रक्रिया में मज़ा लेता है, प्राप्त कर लेने में नहीं। इसीलिए लोग कहते हैं:  “Journey ज़्यादा खूबसूरत थी, मंज़िल नहीं।”

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आपकी जिंदगी से जुड़े कुछ उदाहरण:

ये सिर्फ थ्योरी नहीं, आपकी डेली लाइफ का हिस्सा है। देखिए कैसे:

प्यार का कड़वा सच:

जिस प्यार को पाने के लिए कोई परिवार, समाज, दोस्तों सबको छोड़ देता है- वो ‘एकमात्र’ लगता है। सालों की लड़ाई-झगड़े के बाद वो मिलता है। लेकिन शादी के कुछ साल बाद? वही जीवनसाथी बेजार लगने लगता है। छोटी बातें खटकती हैं, नजरें कहीं और भटकने लगती हैं। प्यार में शुरुआत ‘हनीमून फेज’ होती है। 2 साल बाद रियलिटी चेक होता है।

करियर:

प्रमोशन मिलने पर खुशी का ठिकाना नहीं रहता- बॉस की तारीफ, सैलरी बढ़ी, स्टेटस मिला। लेकिन 1-2 महीने बाद? वही मीटिंग्स, डेडलाइन्स और ऑफिस पॉलिटिक्स बोरिंग लगने लगते हैं। दिमाग सोचता है, “अगला प्रमोशन कब?”- हे डॉनिक ट्रेडमिल का कमाल

फिटनेस:

जिम जॉइन करते ही मोटिवेशन हाई- नए कपड़े, ट्रेनर की सलाह, वर्कआउट का रोमांच। पहले 15 दिन बॉडी टोन होती दिखती है, इंस्टा स्टोरीज भरते हैं। लेकिन 3 हफ्ते बाद थकान, समय की कमी और रिजल्ट न दिखने से बोरियत। भारत में 80% लोग इसी मोहभंग से जिम छोड़ देते हैं- शुरुआती डोपामाइन खत्म हो जाता है। अमिताभ बच्चन ने कहा था, “सिक्स पैक्स के बाद भी खुशी नहीं मिली।”

महत्वपूर्ण बात: मोहभंग होना इस बात का प्रमाण नहीं कि आपने गलत चुना। यह प्रमाण है कि आप इंसान हैं। हर इच्छा पूरी होने पर दिमाग नई इच्छा पैदा करेगा क्योंकि यही उसकी प्रकृति है। अगर ऐसा न होता तो मानव प्रगति रुक जाती।

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समाधान क्या है? ताकि हम हर चीज़ से जल्दी ऊब न जाएँ

1. “पाने” को नहीं, “जीने” को लक्ष्य बनाइए- खुशी भविष्य में नहीं, वर्तमान में ही टिकती है।

2. कृतज्ञता को रोज़ का अभ्यास बनाइए- जो आपके पास है, उसे सचेत रूप से देखना और सराहना सीखिए।

3. लोगों और चीज़ों को परफेक्ट नहीं, मानवीय समझिए- अपेक्षाएँ कम होंगी, तो निराशा भी कम होगी।

4. उत्तेजना नहीं, अर्थ खोजिए- जो अर्थपूर्ण होता है, वही लंबे समय तक संतोष देता है, वह उबाऊ नहीं लगता।

5. नए अनुभव जोड़ें- पुरानी चीज में नयापन लाएं- जैसे पार्टनर के साथ नया हॉबी, घर में नया कलर।

6. सादगी अपनायें- बहुत कम और जरुरी चीजें ही रखें- कम चीजें, ज्यादा खुशी देती हैं।

7. 10 मिनट रोज ध्यान लगाएं, सांस पर फोकस करें। ये दिमाग को ‘अभी’ में लाता है, भविष्य की चाहत कम करता है।

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निष्कर्ष

जिस चीज़ को हम पा लेते हैं उससे मोहभंग इसलिए नहीं होता क्योंकि वह बेकार है, बल्कि इसलिए क्योंकि हमारा दिमाग स्थिर खुशी के लिए नहीं, निरंतर चाहत के लिए बना है। समस्या चीज़ में नहीं है, हमारी मानसिक संरचना में है। मोहभंग जीवन का हिस्सा है, लेकिन इसे कंट्रोल कर आप खुद को बेहतर कर सकते हैं। याद रखें- सच्ची खुशी बाहर नहीं, अंदर है। आज से आभार व्यक्त करना शुरू करें।

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https://thedecisionlab.com/reference-guide/psychology/hedonic-treadmill

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