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काम टालने की आदत छूट ही नहीं रही- क्या ये सिर्फ आलस है?

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काम टालने की आदत छूट ही नहीं रही- क्या ये सिर्फ आलस है?

procrastination in hindiक्या आपने कभी महसूस किया है कि महत्वपूर्ण काम को करने की बजाय आप फोन स्क्रॉल करते रहते हैं, या सोशल मीडिया पर घंटों बिताते हैं? “कल कर लेंगे” यह वाक्य आपके मुँह से निकलता रहता है, लेकिन कल फिर वही होता है।

भारत में लाखों लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। एक सर्वे के अनुसार, 20-25% वयस्क प्रोक्रास्टिनेटर्स (काम टालने वाले) होते हैं, जो अपनी उत्पादकता को 20% तक कम कर देते हैं। लेकिन सवाल यह है – क्या यह सिर्फ आलस है? या इसके पीछे मनोवैज्ञानिक कारण हैं?

नहीं, प्रोक्रास्टिनेशन सिर्फ आलस नहीं है। यह एक जटिल व्यवहार है, जो डर, तनाव, परफेक्शनिज्म और ब्रेन केमिस्ट्री से जुड़ा है। इस ब्लॉग में हम गहराई से समझेंगे कि काम टालना क्यों होता है और इसे कैसे दूर किया जाए। अगर आप स्टूडेंट, प्रोफेशनल या पैरेंट हैं, तो ये टिप्स आपके जीवन को बदल सकते हैं। चलिए शुरू करते हैं!

काम टालना आखिर है क्या? आलस से इसका फर्क समझें

काम टालना मतलब- किसी ज़रूरी काम को जानते-बूझते हुए बाद के लिए टाल देना, जबकि हमें पता होता है कि इससे परेशानी बढ़ेगी। दिलचस्प बात यह है कि ज़्यादातर लोग टालते समय आराम भी महसूस नहीं करते। दिमाग में अपराधबोध, चिंता और डर चलता रहता है, फिर भी हम काम शुरू नहीं कर पाते।

यानी समस्या काम करने की क्षमता की नहीं, बल्कि काम शुरू करने की मानसिक स्थिति की होती है। आलस और काम टालना एक जैसे नहीं हैं। आलस में व्यक्ति काम करना ही नहीं चाहता, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। काम टालने वाला व्यक्ति काम तो करना चाहता है, लेकिन किसी अंदरूनी रुकावट, या भावनात्मक बाधाओं की वजह से कर नहीं पाता।

उदाहरण: आलसी व्यक्ति जिम नहीं जाएगा क्योंकि उसे एक्सरसाइज पसंद ही नहीं। लेकिन प्रोक्रास्टिनेटर जिम जाना चाहता है, पर डरता है कि पहली बार असफल हो जाएगा, इसलिए नेटफ्लिक्स देख लेता है। अध्ययन बताते हैं कि भारत में 40% युवा इस आदत से प्रभावित हैं, खासकर कोविड के बाद।

इसे भी देखें –ये आदत धीरे-धीरे डिप्रेशन की ओर ले जाती है !

काम टालने के पीछे छुपे वैज्ञानिक कारण

किन कारणों से लोग काम को टालते हैं यह जानना सबसे जरुरी है –

1. दिमाग के अंदर का युद्ध

हमारा दिमाग दो हिस्सों में बँटा है। लिम्बिक सिस्टम (भावनाओं का केंद्र) तुरंत खुशी चाहता है – जैसे चॉकलेट खाना या वीडियो देखना। वहीं प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स (योजना का केंद्र) लॉन्ग-टर्म लक्ष्य सोचता है। काम टालना तब होता है जब लिम्बिक सिस्टम जीत जाता है।

हार्वर्ड की स्टडी (2018) में पाया गया कि MRI स्कैन में प्रोक्रास्टिनेटर्स के प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स में कम एक्टिविटी होती है। डोपामाइन (खुशी का हॉर्मोन) का असंतुलन भी इसके लिए जिम्मेदार है, तुरंत रिवॉर्ड मिलने पर यह रिलीज होता है, लॉन्ग-टर्म वाले काम में नहीं।

2. परफेक्शनिज्म और फेलियर का डर

कई लोग काम इसलिए टालते हैं क्योंकि वे परफेक्ट रिजल्ट चाहते हैं। मनोवैज्ञानिक डॉ. नील्स ने कहा, “परफेक्शनिस्ट्स शुरू ही नहीं करते, क्योंकि शुरू में गलती का डर लगता है।” एक रिसर्च में 500 लोगों पर अध्ययन से पता चला कि 70% प्रोक्रास्टिनेशन परफेक्शनिज्म से जुड़ा है।

सही शुरुआत नहीं मिल रही, परफेक्ट प्लान नहीं बन पा रहा, डर कि लोग जज करेंगे। नतीजा- काम शुरू ही नहीं होता। हमारी संस्कृति में ‘फर्स्ट क्लास’ की अपेक्षा इसे बढ़ावा देती है। स्टूडेंट्स एग्जाम की तैयारी टालते हैं क्योंकि 100% न आए तो शर्मिंदा होंगे, आत्मसम्मान को ठेस लगेगी।

3. भावनात्मक असहजता से बचना

कुछ काम भावनात्मक रूप से असहज होते हैं, जैसे: किसी से कठिन बात करना, फाइल या रिपोर्ट देखना, स्वास्थ्य से जुड़ी जांच। दिमाग उस असहज भावना से बचने के लिए काम टाल देता है। डॉ. फुर्स्ट ने साबित किया कि काम टालना ‘मूड रिपेयर’ की कोशिश है। काम से पहले नेगेटिव इमोशन्स (चिंता, बोरियत) महसूस होते हैं, इसलिए हम उन्हें अवॉइड करने के लिए काम टालते हैं।

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4. आत्मविश्वास की कमी

किसी भी काम को शुरू करने के लिए आत्मविश्वास की जरुरत होती है। जब हमें खुद पर भरोसा नहीं होता, तब हर काम भारी लगने लगता है। दिमाग बार-बार कहता है- “तुमसे नहीं होगा।” ऐसे में काम टालना एक तरह का बचाव बन जाता है।

5. अन्य कारक: डिप्रेशन और पर्यावरण

आजकल दिमाग हर समय सूचनाओं से भरा रहता है- मोबाइल, नोटिफिकेशन, जिम्मेदारियाँ। जब मानसिक ऊर्जा कम होती है, तो दिमाग मुश्किल कामों से भागने लगता है। डिप्रेशन में मोटिवेशन कम होता है। पर्यावरण भी बहुत मायने रखता है, अच्छे माहौल में काम करने की रूचि पैदा होती है। डिस्ट्रैक्शन्स जैसे फ़ोन के नोटिफिकेशन्स इसे बढ़ाते हैं। एक स्टडी (APA, 2022) में पाया गया कि स्मार्टफोन इस्तेमाल करना 30% काम टालने का कारण है।

काम टालने के नुकसान:

किसी भी काम को कल पर टाल देना सिर्फ समय की बर्बादी नहीं होती बल्कि उससे भी बहुत ज्यादा नुकसान होता है।

मानसिक स्वास्थ्य:

लगातार काम टालने की आदत से चिंता 2 गुना बढ़ जाती है। काम टलता जाता है, लेकिन दिमाग से जाता नहीं। यह अंदर ही अंदर तनाव पैदा करता है। लगातार अपराधबोध और असफलता की भावना व्यक्ति को मानसिक रूप से कमजोर कर सकती है।

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करियर:

काम टालने की वजह से उत्पादकता 15-20% कम होती है और प्रमोशन के चांस घटते हैं। काम टालने की आदत कई बार अच्छे मौकों को हाथ से निकलने देती है। जिसका बाद में पछतावा होता है।

रिश्तों पर असर

वादे न निभाने से विश्वास टूटता है। काम टालने वाले के रिश्तों पर इसका बहुत असर पड़ता है। डेडलाइन मिस होना, वादे पूरे न कर पाना- इससे प्रोफेशनल और पर्सनल रिश्तों में तनाव बढ़ता है।

शारीरिक स्वास्थ्य:

काम टालते रहने के तनाव से हाई BP, नींद की कमी आदि समस्याएं होती हैं। असफलता की भावना, फेलियर का डर व्यक्ति को अंदर से कमजोर कर देता है, जो अनेक बिमारियों का कारण बनता है।

आत्मसम्मान में गिरावट:

बार-बार खुद से किए वादे टूटने लगते हैं। धीरे-धीरे खुद पर भरोसा कम होने लगता है। व्यक्ति का आत्मविश्वास और आत्मसम्मान दोनों गिरता है। भारत में, जहां जॉब मार्केट कठिन है, यह आदत लाखों युवाओं का करियर बर्बाद कर रही है।

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इसे दूर करने के प्रैक्टिकल स्ट्रेटजीज:

अब बात समाधान की। ये तरीके वैज्ञानिक रूप से सिद्ध हैं और आसानी से अपनाए जा सकते हैं।

1. ‘2-मिनट रूल’ अपनाएँ

जेम्स क्लियर (Atomic Habits) कहते हैं: कोई काम अगर 2 मिनट में शुरू हो सकता है, तो अभी शुरू करें। उदाहरण: रिपोर्ट लिखनी है? पहले सिर्फ 2 मिनट आउटलाइन बनाएँ। स्टडी दिखाती है कि काम शुरू कर देने पर 80% लोग उसे पूरा करते हैं।

दिमाग बड़े काम से डरता है, छोटे से नहीं। हर काम को छोटे चंक्स में तोड़ें। टाइमर सेट करें: पहले 5 मिनट काम, फिर ब्रेक। खुद से कहें- “मैं सिर्फ 5 मिनट यह काम करूँगा।” बस शुरुआत करने का लक्ष्य रखें। अक्सर शुरुआत के बाद काम अपने आप आगे बढ़ जाता है।

2. पोमोडोरो टेक्नीक

फ्रांसेस्को सिरिलो द्वारा विकसित तकनीक : 25 मिनट काम, 5 मिनट ब्रेक। इसे अपनाने से बोरियत और उलझन नहीं होती। एक स्टडी (2011) में 200 लोगों ने इस तकनीक को अपना कर 25% उत्पादकता बढ़ाई। हर काम के पीछे का कारण लिखकर रखें- यह काम क्यों ज़रूरी है, इससे आपकी ज़िंदगी में क्या बदलेगा।

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3. अपने इमोशन्स को हैंडल करें

भावनाओं से भागना समाधान नहीं है। खुद से पूछें- मैं इस काम से क्यों बच रहा हूँ? इसमें मुझे क्या डर लग रहा है? अगर गलती हो जाएगी तो अधिक से अधिक क्या नुकसान होगा ? सिर्फ पहचानना ही आधा समाधान है। डॉ. फुर्स्ट की थेरेपी: काम से पहले भावनाओं को नाम दें। “मैं चिंतित हूँ क्योंकि…” कहें। फिर 5 मिनट मेडिटेशन। रिसर्च में इससे काम टालने में 60% की कमी पाई गई।

4. परफेक्शनिज्म को चैलेंज करें

परफेक्ट नहीं, प्रोग्रेस पर ध्यान दें, खुद को याद दिलाएँ- अधूरा काम, न किए गए परफेक्ट काम से बेहतर है। ‘गुड एनफ’ अपनाएँ। ड्राफ्ट पहले बनाएँ, एडिट बाद में करें। नेगेटिव विचारों को चैलेंज करें- “क्या सच में हर जगह परफेक्ट होना जरूरी है?”

5. पर्यावरण को सही करें

डिस्ट्रैक्शन को सीमित करें- फोन दूर रखें, या ‘डू नॉट डिस्टर्ब’ पर रखें। नोटिफिकेशन बंद करें, एक समय में एक ही काम करें। अपने वर्कस्पेस को साफ सुथरा रखें। जिम्मेदार पार्टनर बनाएँ, अपने दोस्त को प्रोग्रेस बताएँ, फीडबैक लें। स्टडी: इससे 65% सफलता बढ़ती है।

6. आदत से जोड़ना और रिवॉर्ड सिस्टम

किसी भी नए काम को अपनी पुरानी हैबिट से जोड़ें, जैसे – चाय पीने के बाद 10 मिनट पढ़ाई। या चाय से पहले 15 मिनट तेज टहलना। काम के बाद खुद को रिवॉर्ड दें – फेवरेट सॉन्ग सुनें। यह काम डोपामाइन (ख़ुशी/संतुष्टि का हार्मोन) को बैलेंस करता है। “मैं निकम्मा हूँ” जैसी बातें आदत को और मजबूत करती हैं। इसकी जगह कहें- “मुझे कठिनाई हो रही है, लेकिन मैं सीख रहा हूँ।”

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लाइफस्टाइल के अनुकूल टिप्स

भारत में फैमिली प्रेशर, ट्रैफिक और अनियमित रूटीन बड़ी चुनौतियाँ हैं। इनसे निपटने के लिए कुछ आदतें डालनी होंगी।

  • सुबह 5 बजे उठकर ‘सूर्य नमस्कार’ से शुरू करें – योग काम टालने की आदत को 40% कम करता है (AIIMS स्टडी)।
  • भारतीय भोजन में ओमेगा-3 (अलसी, अखरोट) शामिल करें – यह ब्रेन हेल्थ सुधारता है।
  • वर्क फ्रॉम होम में ‘भजन टाइमर’ यूज करें – 25 मिनट काम के बाद भजन सुनें।

क्या एक दिन में यह आदत छूट सकती है?

नहीं। और यही सबसे बड़ी सच्चाई है। काम टालने की आदत सालों में बनती है, तो उसे बदलने में भी समय लगेगा। हर छोटा कदम, हर छोटी जीत- इस प्रक्रिया का हिस्सा है। अगर आप आज काम टाल रहे हैं, तो आप आलसी नहीं हैं। शायद आप थके हुए हैं, डरे हुए हैं, या खुद पर ज़्यादा दबाव डाल रहे हैं। समाधान खुद को डाँटना नहीं, बल्कि खुद को समझना है।

निष्कर्ष

काम टालना आलस नहीं, बल्कि दिमाग की ट्रिक है। समझकर इसे कंट्रोल किया जा सकता है। आज ही एक छोटा स्टेप लें – अगला काम टालने की बजाय 2 मिनट शुरू करें। लगातार प्रयास से आपकी लाइफ ट्रांसफॉर्म हो जाएगी। परफेक्शन नहीं, प्रोग्रेस महत्वपूर्ण है।

काम टालने की आदत कोई चरित्र दोष नहीं है। यह एक संकेत है कि आपके अंदर कुछ ऐसा है जिसे समझने और सुलझाने की ज़रूरत है।जब आप कारण समझ लेते हैं, तो समाधान अपने आप रास्ता दिखाने लगता है। याद रखिए- शुरुआत छोटी हो सकती है, लेकिन वही सबसे बड़ा बदलाव लाती है।

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