नींद से टालमटोल: देर रात तक जागे रहने का मनोविज्ञान

आप भी क्या रोज रात को- बस 10 मिनट और… सोचते हुए मोबाइल या टीवी में डूबे रहते हैं, जबकि जानते हैं कि आपको जल्दी उठना है? क्या आपने कभी ऐसा किया है कि दिनभर थकने के बाद भी, बिस्तर पर लेटे हुए फोन स्क्रॉल करते-करते आधी रात गुज़ार दी?
आप जानते हैं कि आपको सो जाना चाहिए, लेकिन दिमाग कहता है- “बस पाँच मिनट और!” अगर हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं। आप Revenge Bedtime Procrastination नाम की एक आधुनिक मानसिक आदत का हिस्सा हैं।
देर रात तक जागने की यह आदत सिर्फ मनोरंजन है या इसके पीछे दबी हुई कोई मनोवैज्ञानिक वजह छिपी है? आजकल कई लोग इस समस्या के शिकार हैं- ऐसे समझिये कि यह आधुनिक जीवन की नई मानसिक चुनौती है।
Revenge Bedtime Procrastination क्या है?
यह संज्ञा पहली बार चीनी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म वीबो पर सामने आई जब लोगों ने ‘996’ वर्कशेड्यूल (सुबह 9 से रात 9 तक, सप्ताह में 6 दिन) के बाद पर्सनल टाइम की कमी महसूस की, तब रात को जागना एक तरह का ‘बदला’ माना गया- दिनभर की कैद से खुद को आज़ाद करने का मौका. इस आदत में व्यक्ति जानबूझकर अपनी नींद को टालता है और पसंदीदा एक्टिविटी करता है जैसे- फिल्म देखना, चैट पर रहना या गेम खेलना।
धीरे-धीरे यह ट्रेंड पूरी दुनिया में फैल गया क्योंकि हर जगह लोग वही महसूस कर रहे थे “दिन मेरा नहीं, तो रात तो मेरी हो।” यह ‘Revenge’ असल में किसी व्यक्ति से नहीं, बल्कि दिनभर की व्यस्तता और थकावट से बदला होता है। दिनभर काम, जिम्मेदारियाँ, दूसरों की माँगें और रात को जब सब शांत होता है, तो मन कहता है- “अब वक्त मेरा है।” यही मेरा वक्त (me time) ही हमें जागाये रखता है।
यह आदत जिसमें व्यक्ति देर रात तक जागे रहता है, जबकि उसे अच्छी तरह से पता है कि पर्याप्त नींद उसके लिए क्यों ज़रूरी है—फिर भी वह खुद की नींद को टालता है और सुबह थकान, चिड़चिड़ापन और कम ऊर्जा का अनुभव करता है. इस व्यवहार के पीछे मनोविज्ञान, आधुनिक जीवनशैली, आत्म-नियंत्रण की चुनौतियाँ और डिजिटल व्याकुलताओं की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।
इसके लक्षण (Symptoms)
आप “Revenge Bedtime Procrastination” का शिकार हो सकते हैं अगर —
1. आप जानते हैं कि आपको सोना चाहिए, लेकिन फिर भी जानबूझकर जागते हैं।
2. दिनभर काम करते हुए “मेरे पास टाइम नहीं है” महसूस करते हैं।
3. रात में आपको लगता है कि यह “आपका अपना समय” है।
4. आप देर तक फ़ोन या स्क्रीन देखते हैं, भले ही नींद आ रही हो।
5. सुबह उठते ही पछतावा होता है “मुझे इतना देर तक नहीं जागना चाहिए था।”
इसे भी पढ़ें – नींद की कमी और मानसिक तनाव के बीच सीधा सम्बन्ध
मनोवैज्ञानिक कारण
व्यक्तिगत नियंत्रण की कमी: दिन भर की जिम्मेदारियां, ऑफिस व परिवार की मांगें, समय का अभाव, व्यक्ति को लगने लगता है कि उसकी ज़िंदगी उसके अपने हाथ में नहीं है। इस दुःख को वो रात में जागकर कम करता है।
आत्म-नियंत्रण में कमी: कई लोग जानते हैं कि उन्हें सोना चाहिए लेकिन वे अपनी लोकल इच्छाओं पर विजय नहीं पा सकते—इसे ‘Intention-Behavior Gap’ कहा जाता है। दिन भर के निर्णय हमारे लिए कोई और लेता है। रात को हम control वापस पाने की कोशिश करते हैं- “अब मैं तय करूँगा क्या करना है।”
डिजिटल डिस्ट्रैक्शन और त्वरित संतुष्टि: मोबाइल और ओटीटी प्लेटफॉर्म लगातार कंटेंट उपलब्ध कराते हैं; देर रात में यह कनेक्शन और आज़ादी का झूठा एहसास देता है तनाव में हमारा दिमाग ख़ुशी बटोरने/मज़ा लेने के मूड में चला जाता है।
फोन स्क्रॉल करना या सीरीज़ देखना एक तात्कालिक “पलायन” जैसा लगता है।
“बस पाँच मिनट और” का मनोविज्ञान
अक्सर लोग कहते हैं “जो देर तक जागते हैं, वो lazy (आलसी) हैं।” लेकिन सच्चाई यह नहीं है। यह एक तरह का भावनात्मक विद्रोह है- जो बताता है कि व्यक्ति दिनभर अपना समय नहीं जी पा रहा। वह खुद से disconnect हो गया है, और रात को वही connection ढूंढता है।
जब हम कहते हैं “बस पाँच मिनट और”, तो यह सिर्फ़ आलस्य नहीं होता, यह हमारे दिमाग की एक self-regulation failure होती है। दिनभर हम अनकहे ही दूसरों के नियंत्रण में रहते हैं- बॉस, डेडलाइन, परिवार, ज़िम्मेदारियाँ। लेकिन रात को पहली बार हमें स्वतंत्रता मिलती है।
दिमाग कहता है “अब कोई रोक नहीं सकता।” और हम वही करते हैं जो हमें तुरंत ख़ुशी देता है- फ़ोन स्क्रॉल करना, YouTube, Netflix, Instagram…यह तुरंत डोपामाइन रिलीज़ करता है और नींद जैसी “(देर से मिलने वाला पुरस्कार) delayed reward” को हम टाल देते हैं।

तुरंत और देर से मिलने वाले पुरस्कार का संघर्ष
हमारा दिमाग दो हिस्सों में बँटा होता है- 1 – आदिम या प्रारंभिक मस्तिष्क (तत्काल संतुष्टि की चाह) 2 – तर्कसंगत मस्तिष्क (दीर्घकालिक सोच)
जब हम थके होते हैं, तो प्रारंभिक मस्तिष्क हावी हो जाता है। यह कहता है “अभी मस्ती चाहिए।” “थोड़ी देर और रह लो ऑनलाइन।” जबकि तर्कसंगत मस्तिष्क कहता है “कल जल्दी उठना है, सो जाओ।” और इस खींचतान में जीत अक्सर “instant reward” की होती है क्योंकि वो तुरंत सुख देता है, भले ही अगले दिन पछतावा (regret) क्यों न हो। और हम फ़ोन या टीवी पर चिपके रह जाते हैं।
वर्किंग प्रोफेशनल्स के लिए खुद को बेहतर बनाने के 12 उपाय
सामाजिक और सांस्कृतिक संदर्भ
यह बदला किसी इंसान से नहीं, बल्कि सिस्टम, समय-सारिणी और सामाजिक दबावों से है। दिनभर की भागदौड़ में हम खुद के लिए वक़्त नहीं निकाल पाते। रात को जब चारों ओर सन्नाटा होता है, तो हमें लगता है-“अब कोई मुझे नियंत्रित नहीं कर रहा, अब मैं आज़ाद हूँ।”
हमारी संस्कृति में ‘रात का सुकून’: भारत व अन्य देशों में परिवार व काम के वक्त के बाद रात का समय व्यक्ति पूरी तरह खुद के लिए चाहता है, और तब वह जागना पसंद करता है।
महिलाओं और युवा विद्यार्थी सबसे अधिक प्रभावित: शोध से पता चला है कि Revenge Bedtime Procrastination सबसे ज़्यादा महिलाओं व छात्रों में पाया जाता है, खासकर उन्हीं के बीच जिनका दिन भागदौड़ में व्यस्त होता है।
इस आदत के दुष्प्रभाव
नींद की गुणवत्ता में गिरावट: नींद में कटौती से अगला दिन ऊर्जाहीन, चिड़चिड़ा हो जाता है; इसका असर मानसिक सेहत, याददाश्त और नये ज्ञान को अपनाने की क्षमता पर पड़ता है।
डिप्रेशन, एंग्जायटी और स्ट्रेस: लगातार नींद टालने से मानसिक समस्याएं उभर सकती हैं; व्यक्ति का मूड बिगड़ता है और तनाव बढ़ता है, लगातार थकान और आलस्य, मूड में उतार चढ़ाव और चिड़चिड़ापन, याददाश्त और creativity में गिरावट, चिंता में बढ़ोतरी, लम्बे समय में depression के लक्षण।
शारीरिक स्वास्थ्य पर असर: हार्मोनल असंतुलन, मोटापा बढ़ना, हृदय रोग, डायबिटीज का खतरा बढ़ता है।
Self-Sabotage: हम खुद को सफल होने से क्यों रोकते हैं?
क्या है इसका समाधान
जब आपको इस समस्या के कारन और लक्षणों का पता चल चुका है तो अब समाधान पर भी ध्यान देना जरुरी है जिससे शारीरिक और मानसिक सवास्थ्य बना रहे –
1. दिन में छोटे-छोटे “Me Time” जोड़ें
हर दिन 15–20 मिनट सिर्फ़ अपने लिए रखें। यह “emotional control” वापस पाने में मदद करेगा, और रात को बदला लेने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। जानें और समझें कि देर रात जागने से आपको क्षणिक खुशी मिलती है, पर इसके दीर्घकालिक नुकसान ज़्यादा हैं।
2. Digital Sunset Routine बनाएं
डिजिटल उपकरणों से दूरी बनाये बिना इस समस्या से निकलना संभव नहीं है। सोने से 30 मिनट पहले फोन, लैपटॉप और टीवी से दूरी बनाएं, इन्हें बंद कर दें। इस समय किताब पढ़ें, डायरी लिखें या कोई शांत संगीत सुनें।
3. नींद का समय तय करें
धीरे-धीरे अपनी आदतों में बदलाव शुरू करें, अगर आप 10 बजे सो नहीं सकते, तो सीधे 10 का लक्ष्य न रखें। पहले 1 बजे की जगह 12 :30, फिर 12 फिर 11.30 — इस तरह धीरे-धीरे biological clock को train करें।
4. शयन कक्ष का वातावरण:
जहाँ आप सोते हैं वहां का वातावरण, स्वच्छता और माहौल आपके नींद में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसलिए कमरे को हमेशा साफ़ सुथरा रखें, एकदम हलकी लाइट, हलकी खुशबू, न ज्यादा ठंडा न गरम वातावरण।
5. आरामदायक आदतें अपनाएं:
सोने से पहले गर्म पानी से नहाना, तेल से पैरों और हथेलियों में मालिश करना, कुछ पढ़ना, हल्का योग करना या डायरी लिखने जैसी आराम देने वाली गतिविधियाँ करें। इनसे जल्दी और आरामदायक नींद आती है।
विशेषज्ञों और शोध की राय
न्यूरोसाइंस और बिहेवियरल साइकोलॉजी बताती है कि इस व्यवहार की वजह Dopamine-driven reward cycle है, जिसमें व्यक्ति छोटी-छोटी खुशियाँ (जैसे सोशल मीडिया पर लाइक मिलना, गेम जीतना, फनी रील्स पर हसने) के लिए नींद को टालता है।
एक इंडोनेशियाई अध्ययन में पाया गया है कि विश्वविद्यालय-छात्रों में Revenge Bedtime Procrastination (RBP) का 59.5% हिस्सा “उच्च” स्तर पर था। शोध में यह पाया गया कि जो लोग दिनभर बहुत ज़्यादा व्यस्त रहते हैं- जिन्हें अपने व्यक्तिगत समय (me-time) या आराम का मौका नहीं मिलता, वे रात को सोने में जानबूझकर देर करते हैं।
एक शोध ने यह पाया कि जिन लोगों की अपनी भविष्य की सोच कमजोर होती है, वे RBP के प्रति ज़्यादा प्रवण prone होते हैं, मतलब ऐसे लोग रात में देर तक जागते हैं। इसके साथ-साथ स्मार्टफोन का अत्यधिक इस्तेमाल भी एक कारक है।
प्रमुख स्वास्थ्य संसाधनों ने भी RBP को एक मान्यता प्राप्त व्यवहार माना है, जिसमें बताया गया है कि यह “सोने की समय सीमा” (bedtime) जानबूझकर टालने वाला व्यवहार है, न कि केवल सामान्य देर तक जागना।
क्या भारतीय युवाओं के लिए चुनौती बढ़ रही है? ऑनलाइन क्लासेज़, सोशल मीडिया, वर्क फ्रॉम होम के कारण कई युवा अब देर रात तक स्क्रीन से जुड़े रहते हैं। भारतीय संस्कृति की सामूहिकता व परिवारवाद के चलते कई बार पर्सनल समय की कमी लगती है, जिसकी पूर्ति ‘Revenge Bedtime Procrastination’ से होती है।
20 असरदार रिलैक्सेशन तकनीकें – तनाव से पूर्ण राहत की गाइड
निष्कर्ष
सोने के समय में जानबूझकर टालमटोल (‘Revenge Bedtime Procrastination’) आधुनिक कामकाजी और पारिवारिक जीवन की एक अनदेखी समस्या है, जिसमें इंसान दिनभर की व्यस्तता और बंधनों का बदला अपनी नींद टालकर लेता है. पर यह बदला अल्पकालिक संतुष्टि देकर लंबी बीमारी व तनाव की वजह बन सकता है। व्यवहारिक सुधार, जागरूकता और अपने मानसिक स्वास्थ्य की रक्षा ही इसका सही समाधान है।
दूसरे शब्दों में Revenge Bedtime Procrastination आधुनिक जीवन की एक मौन पुकार है- “मुझे थोड़ी आज़ादी चाहिए।” लेकिन अगर हम उस आज़ादी को नींद और सेहत की क़ीमत पर खरीदते हैं, तो ये बदला धीरे-धीरे स्वयं का विनाश या स्वयं की हानि बन जाता है।
इसलिए दिन में खुद के लिए छोटे-छोटे “pause” जोड़िए, ताकि रात को ऐसे विद्रोह की ज़रूरत ही न पड़े। और याद रखिए —
आराम आलस्य नहीं है, बल्कि आत्म-देखभाल (self-care) का सबसे सुंदर रूप है।
FAQs
Q1: क्या ‘Revenge Bedtime Procrastination’ बीमारी है?
नहीं, यह व्यवहार है, लेकिन यह लगातार बना रहे तो यह मानसिक व शारीरिक समस्या का कारण बन सकता है
Q2: यह आदत किसे अधिक प्रभावित कर सकती है?
जो लोग दिनभर जिम्मेदारियों, काम व परिवार की मांगों से घिरे हैं, उनमें पर्सनल टाइम कम पड़ता है, ऐसे लोग अधिक प्रभावित होते हैं
Q3: क्या इससे छुटकारा संभव है?
हाँ, व्यवहार में छोटे बदलाव, रूटीन बनाना, टेक्नोलॉजी डिटॉक्स, स्लीप हाइजीन व सेल्फ-एकाउंटेबिलिटी के जरिये इस पर काबू पाया जा सकता है।
यदि आपको ये ब्लॉग पसंद आया हो तो इसे शेयर करें। अन्य जानकारी के लिए हमसे मेल पर जुड़ें-
https://www.sleepfoundation.org/sleep-hygiene/revenge-bedtime-procrastination
