हमें तारीफ की भूख क्यों लगती है? Approval Addiction का सच
मानव मन एक जटिल संरचना है। हम सब अपने जीवन में कभी न कभी दूसरों की सराहना, तारीफ या अनुमोदन चाहते हैं। यह इच्छा यदि जरूरत से ज्यादा बढ़ जाए, तो यह Approval Addiction या मान्यता की भूख बन जाती है।
हम इंसान हैं- और इंसान सामाजिक प्राणी है लेकिन सामाजिक होने और दूसरों की स्वीकृति की लत में फर्क है। बहुत से लोग दिखने में कॉन्फिडेंट होते हैं, पर अंदर से वे एक बार लाइक, एक बार तारीफ, एक अनुमोदन के बिना बेचैन हो जाते हैं।
ये सब सिर्फ आदत नहीं है- ये लगातार दूसरों से स्वीकृति की जरूरत है, यानी दूसरों की स्वीकृति की लत है। इस ब्लॉग में हम समझेंगे कि दिमाग को दूसरों की तारीफ की भूख क्यों लगती है और आखिर इससे बाहर कैसे निकला जाए।
Approval Addiction क्या है
यह एक ऐसी मानसिक अवस्था है जिसमें व्यक्ति का आत्म-मूल्य (self-worth) पूरी तरह दूसरों की राय, प्रशंसा या स्वीकृति (validation) पर टिका होता है। जो लोग इससे जूझते हैं, वो हर कदम सोच-समझकर नहीं, बल्कि ये सोचकर उठाते हैं कि: लोग क्या कहेंगे? मेरी इमेज कैसी दिखेगी? मुझे पसंद किया जाएगा या नहीं? उनका दिमाग लगातार बाहरी संकेतों पर निर्भर होने लगता है।
तारीफ की भूख क्यों लगती है ?
प्रशंसा नशे की तरह क्यों लगती है? हर compliment यानी तारीफ दिमाग में डोपामिन रिलीज करती है, जिससे हमें क्षणिक सुख मिलता है। ये ठीक उसी तरह है जैसे मिठाई खाने के बाद मीठा-सा अहसास होता है। धीरे-धीरे यह आनंद हमारी जरूरत बन जाती है। हम हर बार तारीफ या अनुमोदन चाहते हैं, तभी दिमाग को वो ‘high’ मिलता है, जिसकी उसे आदत पड़ जाती है।
धीरे-धीरे दिमाग सीख लेता है कि “अगर खुश होना है तो दूसरों की स्वीकृति चाहिए।” यहीं से शुरू होता है अनुमोदन का सिलसिला और फिर ये एक न्यूरोलॉजिकल आदत बन जाती है।
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स्वीकृति की लत के मनोवैज्ञानिक कारण:
इस आदत के कुछ प्रमुख मनोवैज्ञानिक कारण निम्न हैं –
1. बचपन में रखी गई नींव (Childhood Programming)
दूसरों की स्वीकृति की लत का सबसे बड़ा कारण बचपन है। बचपन में जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, वह दूसरों की नज़रों से खुद को देखने लगता है- माँ-पिता क्या सोचते हैं, शिक्षक क्या कहेंगे, रिश्तेदार क्या तारीफ करेंगे या नहीं। यही प्रक्रिया धीरे-धीरे दूसरों की स्वीकृति की भूख को मजबूत बनाती है।
(1) अच्छे प्रदर्शन पर प्यार: यदि बचपन में बच्चे को बिना शर्त प्रेम (unconditional love) मिलता है, जहाँ उसे गलतियाँ करने की छूट हो, जहाँ प्यार उसके व्यवहार पर नहीं बल्कि उसकी मौजूदगी पर मिले तो बच्चा भीतर से सुरक्षित महसूस करता है। अगर बचपन में हमें प्यार तभी मिला जब हम: अच्छे नंबर लाए, अच्छी लड़की/लड़का बने, दूसरों की बात मानी, शरारत न की- तो दिमाग ने यह मान लिया: प्रेम कमाने की चीज़ है, मिलने की नहीं।
(2) आलोचना वाला माहौल: अगर बचपन में: बहुत डांट पड़ी, बार-बार तुलना हुई, गलती पर शर्मिंदा किया गया, भावनाओं को महत्व नहीं मिला- तो बच्चे ने सीखा कि: “मुझमें कुछ कमी है, मुझे खुद को साबित करना होगा।” ये कमी बड़े होने पर दूसरों की स्वीकृति की लत के रूप में निकलती है।
(3) भावनात्मक उपेक्षा: जब बच्चे की भावनाओं को बार-बार नज़रअंदाज़ किया जाता है, तो वह सामाजिक मान्यता को “भावनात्मक ऑक्सीज़न” समझने लगता है। इस सोच की जड़ें इतनी गहरी जम जाती हैं कि वह बड़ा होने पर भी हर रिश्ते, हर काम, हर स्थिति में स्वीकृति और तारीफ ढूँढता रहता है।
2. लगातार तुलना: Approval Addiction की वजह
जब किसी बच्चे या व्यक्ति की बार-बार दूसरों से तुलना की जाती है-“देखो वह तुमसे बेहतर है,”“उसकी रिपोर्ट कार्ड देखो, तुम क्यों नहीं?”
“फला-फला बच्चा कितना सभ्य है, तुम क्यों नहीं?” तो मन एक खतरे का संकेत सीखता है: “मैं जैसा हूँ, वैसा पर्याप्त नहीं हूँ।” तुलना से तीन गहरी चोटें पड़ती हैं:
1. व्यक्ति अपनी असली पहचान खोने लगता है: जब निरंतर तुलना होती है, तो इंसान अपने भीतर यह मान लेता है कि खुद का मूल्य उसकी क्षमताओं से नहीं, बल्कि दूसरों से बेहतर होने पर निर्भर है। इससे वह अपनी अलग पहचान को भूलकर बाहरी मानकों पर खुद को मापने लगता है।
2. अनुमोदन की भूख बढ़ जाती है: तुलना से मन में असुरक्षा पैदा होती है: “लोग मुझे तभी स्वीकार करेंगे, जब मैं उनसे बेहतर साबित हो जाऊँ।” यह असुरक्षा धीरे-धीरे दूसरों की स्वीकृति की लत में बदल जाती है, क्योंकि व्यक्ति लगातार दूसरों की सराहना और स्वीकृति चाहता है ताकि वह अपनी कमी को भर सके।
3. आत्म-सम्मान धीरे-धीरे कमजोर हो जाता है: तुलना यह संदेश देती है कि: “किसी और की सफलता ही सफलता का मापदंड है।”
इससे आत्म-सम्मान गिरता जाता है, और व्यक्ति खुद को साबित करने के लिए बाहरी तारीफ पर निर्भर होने लगता है।
इसमें परिवार और समाज की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। हमारे समाज में खुद को खुश रखना कम सिखाया जाता है; दूसरों को प्रभावित करना ज़्यादा सिखाया जाता है।
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3. सोशल मीडिया इस समस्या को 10 गुना बढ़ा देता है
सोशल मीडिया एक तरह का “मान्यता का जुआघर” है। यह ऐसा स्थान है जहाँ हर लाइक, कमेंट, शेयर—दिमाग के लिए एक इनाम की तरह काम करता है। आप जितना अधिक समय वहाँ बिताते हैं, उतनी ही ज़्यादा बार आपका मन उस “इनाम” की उम्मीद करने लगता है।
जैसे जुआघर में लोग बार-बार जीत की उम्मीद में घूमते रहते हैं, वैसे ही सोशल मीडिया पर लोग बार-बार नोटिफिकेशन चेक करते रहते हैं-
“किसने लाइक किया?” “किसने कमेंट किया?” “उसका पोस्ट 1k लाइक। मेरा सिर्फ 20। मैं उससे कमतर हूँ।” यह निरंतर प्रतीक्षा दिमाग को धीरे-धीरे इस तरह सिखा देती है कि बिना लाइक-कमेंट के खुद को अच्छा महसूस करना मुश्किल हो जाता है। धीरे-धीरे वास्तविक आत्म-संतोष के स्थान पर बाहरी अनुमोदन मुख्य हमारी प्रेरणा बन जाती है।

4. रिश्तों में अनुमोदन की भूख कैसे दिखाई देती है?
दूसरों की स्वीकृति की लत सिर्फ सोशल मीडिया तक सीमित नहीं है। यह रिश्तों में सबसे ज़्यादा दिखती है। वयक्ति अपने पार्टनर के हर व्यवहार या प्रतिक्रिया पर ज्यादा ही सोचने लगता है – “उसने जवाब क्यों नहीं दिया?” “मैंने कुछ गलत कहा क्या?”
रिश्ते टूटने का डर इतना होता है कि इंसान खुद को ही खो देता है। हमेशा Yes कहना…ना कहने से डरना…रिश्तों में सीमाएं ना तय करना, क्योंकि ऐसे व्यक्ति को लगता है- अगर सीमाएं बनाई तो लोग नाराज़ हो जाएंगे। Toxic रिश्तों को भी पकड़कर रखना: सिर्फ इसलिए कि कोई आपको छोड़ न दे।
Approval Addiction जीवन को कैसे नुकसान पहुंचाता है?
(1) आत्म सम्मान गिर जाता है- खुद पर भरोसा खत्म हो जाता है।
(2) पहचान खो जाती है- आप वो बनने लगते हैं, जो लोग देखना चाहते हैं।
(3) भावनात्मक टूटन – लोगों को खुश करते-करते खुद खाली हो जाते हैं।
(4) निर्णय क्षमता कमज़ोर होती है- क्योंकि हर फैसला लोग क्या सोचेंगे, इससे प्रभावित होता है।
(5) चिंता और तनाव बढ़ता है- ऐसा व्यक्ति हमेशा अलर्ट मोड में रहता है—“कोई नाराज़ न हो जाए।”कोई कमी न रह जाय।
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दूसरों के स्वीकृति की लत से बाहर कैसे निकलें?
दूसरों की तारीफ, प्रशंसा, स्वीकृति और “हाँ” सुनने की आदत मन में इतनी गहरी जड़ें जमा लेती है कि इंसान अपनी पहचान, अपने फैसले और अपनी इच्छाओं को भूलने लगता है। इससे बाहर निकलना संभव है लेकिन इसके लिए चरणबद्ध तरीके से अपने मन को पुनः प्रशिक्षण देना पड़ता है। नीचे कुछ व्यावहारिक और मनोवैज्ञानिक उपाय दिए हैं:
1. व्यवहार को पहचानना: पहला कदम जागरूकता
किसी भी मानसिक आदत से बाहर आने का पहला कदम है- यह जानना कि आप ऐसा क्यों करते हैं। अपने आप से ईमानदारी से ये सवाल पूछें: क्या मैं किसी की नाराज़गी से डरता/डरती हूँ? मैं लोगों को खुश रखने के लिए खुद को थका देता हूँ? क्या मैं बिना वजह दूसरों की राय पर काफ़ी निर्भर हूँ? जब आप अपने भीतर चल रहे पैटर्न को पहचान लेते हैं, तब परिवर्तन शुरू होता है।
2. बचपन के घावों को समझना
इस लत का जन्म अधिकतर बचपन में होता है। यदि बचपन में बार-बार तुलना हुई, गलतियों पर शर्मिंदा किया गया, प्रशंसा कम और आलोचना ज़्यादा मिली, तो मन यह मान लेता है: “मैं तभी अच्छा हूँ जब लोग मुझे अच्छा कहें।” इसलिए अपने भीतर यह समझ विकसित करें कि आपकी वर्तमान आदतें किसी कमी की नहीं, बल्कि पुराने अनुभवों की देन हैं। जब आप यह स्वीकार करते हैं, तब मन में कोमलता आती है और बदलाव आसान हो जाता है।
3. सीमाएँ बनाना सीखें (मर्यादाएँ तय करें)
अनुमोदन की लत वाले लोग किसी को भी “ना” नहीं कह पाते। उन्हें लगता है कि “ना” कहने से लोग नाराज़ हो जाएंगे। लेकिन याद रखें—
मर्यादाएँ बनाना स्वार्थ नहीं, आत्म-सम्मान है। छोटे-छोटे कदम उठाइए: “मैं अभी उपलब्ध नहीं हूँ।”“मैं यह काम इस समय नहीं कर सकता।” “मुझे इस पर सोचने का समय चाहिए।” शुरू में कठिन लगेगा। लेकिन धीरे-धीरे मन सीख जाएगा कि “ना” कहकर भी दुनिया खत्म नहीं होती।
4. स्वयं को मान्यता देना (स्व-मंजूरी)
दूसरों की स्वीकृति की जड़ यह है कि व्यक्ति खुद को पर्याप्त नहीं मानता। इसलिए रोज़ाना स्वयं को मान्यता दें। अपने आप से कहें:“मुझे अपने प्रयासों पर गर्व है।” “मेरी कीमत दूसरों की राय से तय नहीं होती।” “मैं जैसा हूँ, वैसा पर्याप्त हूँ।” जब मन को भीतर से स्वीकृति मिलती है, तब बाहरी स्वीकृति की आवश्यकता घटने लगती है।
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5. लोगों की राय से अलग होना सीखें
लोगों की राय बदलते मौसम की तरह होती है। कभी तारीफ करेंगे, कभी आलोचना। लेकिन आपके अंदर जो असली आप हैं- वह स्थिर है।
अपने आपसे यह वाक्य बार-बार दोहराएँ: “लोगों की राय उनका विचार है, मेरी हकीकत नहीं।” धीरे-धीरे आपका मन दूसरों की बातों का प्रभाव कम लेने लगेगा।
6. धीरे-धीरे “सबको खुश रखने” की आदत कम करें
ऐसे लोग हर समय दूसरों को प्रसन्न रखने की कोशिश करते हैं। लेकिन यह आदत मानसिक थकावट, तनाव और अपनी पहचान खोने का कारण बनती है। यह अभ्यास करें: एक समय में सिर्फ एक व्यक्ति की अपेक्षाएँ पूरी करें, सबकी नहीं। जहाँ संभव हो, काम बाँटें। बिना वजह दूसरों की समस्याएँ अपने ऊपर न लें। जब आप “सबको खुश रखने” का बोझ उतारते हैं, तब मन हल्का होने लगता है।
7. अपनी असल ज़रूरतों और इच्छाओं को सुनें
अनुमोदन की लत के कारण व्यक्ति अपनी इच्छाएँ, पसंद और नापसंद भूल जाता है। इसलिए रोज़ अपने मन से पूछें: मुझे सच में क्या चाहिए? मेरा मन किस दिशा में जाना चाहता है? कौन-सी चीज मुझे खुशी देती है? कभी-कभी जवाब धीमे आते हैं, लेकिन आते ज़रूर हैं।
धीरे-धीरे आप अपनी पहचान वापस पा लेते हैं। सच्चाई यह है कि लोग अपने जीवन में इतने बिज़ी हैं कि वे आपके बारे में उतना नहीं सोचते, जितना आप सोचते हैं।
8. अपने आप से प्रेम करना सीखें
जो व्यक्ति खुद से प्यार नहीं करता, वह दुनिया से प्यार पाने की भूख बढ़ा देता है। अपने आप से प्रेम करने का मतलब है: खुद को गलतियों सहित स्वीकार करना, अपने शरीर का ख्याल रखना, आराम देना, अपनी भावनाओं को महत्व देना, खुद से कठोर नहीं, कोमल व्यवहार करना। जब आप खुद से प्रेम करना सीखते हैं, तब बाहरी स्वीकृति की जरूरत आधी रह जाती है।
9. स्वयं के लिए छोटे-छोटे लक्ष्य तय करें
जब आप अपने दम पर छोटे-छोटे लक्ष्य पूरे करते हैं, तो मन में आत्मविश्वास बढ़ता है। और आत्मविश्वास बढ़ने का मतलब है—बाहरी स्वीकृति की आवश्यकता कम होना। उदाहरण: सुबह सैर पर जाना, एक नई कला सीखना, किसी दिन सिर्फ अपने लिए समय निकालना
अपने कमरे, मेज या वस्तुओं को व्यवस्थित करना। ये छोटी-छोटी उपलब्धियाँ मन को यह सिखाती हैं- “मैं खुद अपने लिए काफी हूँ।”
10. धैर्य रखें: यह परिवर्तन धीरे-धीरे होता है
स्वीकृति की लत से बाहर निकलना एक दिन का काम नहीं है। यह सालों से बनी मानसिक आदत है, जो धीरे-धीरे टूटती है। कभी-कभी पीछे हटेंगे, कभी आगे बढ़ेंगे, यह स्वाभाविक है। लेकिन हर कदम आपको स्वतंत्रता की ओर ले जाता है- उस स्वतंत्रता की ओर, जहाँ आपकी खुशी आपकी अपनी होती है, न कि दूसरों की राय पर टिकी हुई।
निष्कर्ष:
कमजोरी नहीं है, यह एक सीखा हुआ व्यवहार है जिसे बदला जा सकता है। आपके अंदर अपार क्षमता है।
आपका मूल्य दूसरों की नज़रों से तय नहीं होता। आपका मूल्य आपके होने में है। आपकी journey, आपकी मेहनत, आपकी growth—यही आपकी पहचान है। दुनिया की मंज़ूरी कब तक चाहिए? अब अपने आप को मंज़ूरी दें। यहीं से असली आज़ादी शुरू होती है।
दूसरों की मंज़ूरी मीठा पदार्थ है, क्षण भर मीठा देता है, फिर और चाहत पैदा कर देता है। लेकिन अपनी स्वयं की मंज़ूरी…
वह पोषण है, जो मन को स्थिर, संतुलित और मजबूत बनाती है। जब आप खुद को स्वीकार करते हैं, खुद की प्रशंसा करते हैं,
खुद पर भरोसा करना सीखते हैं- तब कोई बाहरी व्यक्ति आपकी कीमत तय नहीं कर सकता। आप स्वयं अपने मूल्य का निर्धारण करते हैं— और यही असली स्वतंत्रता है।
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