Toxic लोग क्यों नहीं भूलते- नेगेटिविटी बायस का मनोविज्ञान

हमारे जीवन में जब भी कोई ‘Toxic’ या जहरीला व्यक्ति आता है, चाहे दोस्त हों, फैमिली या संबंधी- उनका नकारात्मक व्यवहार, अपमान या धोखा लंबे समय तक दिमाग में क्यों रहता है? क्या सिर्फ उनकी बुरी आदतें या शब्द इसका कारण हैं या दिमाग की कोई गहरी साइंस भी इसके पीछे छुपी है? वास्तव में, टॉक्सिक लोगों को भूलना इतना आसान नहीं होता क्योंकि हमारा मन ‘अधूरी कहानी’ को पकड़ कर रखता है
क्या आपने कभी गौर किया है- कितनी बार किसी की एक बुरी बात, ताने या धोखे की याद हमारे साथ सालों तक रहती है? जबकि उसी व्यक्ति की 10 अच्छी बातें धीरे-धीरे दिमाग से मिट जाती हैं। हम कहते हैं –“मैं भूलना चाहता हूँ, लेकिन दिमाग मानता नहीं।”
असल में, यहाँ दिमाग की गलती नहीं होती, बल्कि उसकी प्रकृति होती है। इसी प्रवृत्ति को मनोविज्ञान में कहते हैं- Negativity Bias। चलिए समझते हैं कि आखिर क्यों हमारा दिमाग toxic लोगों और बुरी घटनाओं को इतनी मजबूती से पकड़ कर रखता है, और इससे बाहर कैसे निकला जा सकता है।
क्या है Negativity Bias?
Negativity Bias का मतलब है कि हमारा दिमाग बुरी चीज़ों को अच्छी चीज़ों से ज़्यादा गहराई से नोटिस करता है, याद रखता है और उन पर ज़्यादा प्रतिक्रिया देता है। यानी अगर एक दिन में 10 लोग आपकी तारीफ़ करें और 1 व्यक्ति बुरा बोले, तो रात को दिमाग उसी एक बुरे कमेंट पर फँसा रहेगा।
दिमाग में ‘नेगेटिविटी बायस’ एक प्रमुख कारण है, जिससे नकारात्मक अनुभव व लोग लंबे वक्त तक याद रहते हैं। यह बायस जैसा कि रिसर्च से बताया गया है, हमारे पूर्वजों के ‘सर्वाइवल’ दृष्टिकोण से विकसित हुआ। हमारे पूर्वजों को खतरों (जैसे शत्रु, जंगली जानवर) को नोटिस करना, याद रखना अधिक फायदेमंद था जबकि पॉजिटिव चीज़ें भूल जाने से नुकसान नहीं था।
आज भी यही सिस्टम काम करता है—दिमाग किसी नकारात्मक व्यक्ति, घटना या शब्द को पॉजिटिव अपेक्षा में अधिक गहराई से, तेज़ी से और ज्यादा समय तक संरक्षित रखता है। नेगेटिव अनुभवों के समय दिमाग विशेष केमिकल (जैसे Cortisol) रिलीज करता है, जिससे उस घटना की स्मृति गहरी और स्थायी बनती है।
आज के ज़माने में भले ही खतरे जंगल में नहीं, लेकिन रिश्तों और भावनाओं में हैं। और दिमाग अब भी वही काम करता है – “जो चोट पहुँचाए, उसे याद रखो”।
कैसे पहचानें कि आप एक ज़हरीले [Toxic] रिश्ते में हैं ?
दिमाग का Survival Mode और Toxic लोग
जब कोई हमें toxicity दिखाता है जैसे: भावनात्मक अपमान (emotional abuse), चालाकी, नीचा दिखाना या धोखा देना, तो हमारा Amygdala (brain का “fear center”) तुरंत सक्रिय हो जाता है। यह वही भाग है जो खतरे की पहचान करता है और लड़ो, भागो, या ठहर जाओ प्रतिक्रिया शुरू करता है।
दिमाग उस व्यक्ति या परिस्थिति को “भावनात्मक खतरे” के रूप में मार्क कर देता है। और फिर हर बार जब हम उस व्यक्ति को याद करते हैं, वही न्यूरल सर्किट दोबारा एक्टिव हो जाता है- जैसे दिमाग कह रहा हो – “सावधान रहो, यही वो इंसान है जिसने तुम्हें दर्द दिया था।”
यानी हम toxic व्यक्ति को नहीं, खतरे के संकेत को याद रखते हैं। और दिमाग उसे बार-बार रिप्ले करता है ताकि अगली बार हम “सुरक्षित” रहें।
क्यों पॉजिटिव बातें उतनी याद नहीं रहतीं?
हमारे मस्तिष्क में पॉजिटिव और नेगेटिव अनुभवों को स्टोर करने के दो अलग-अलग सिस्टम हैं।
Negative experiences – Amygdala और Hippocampus मिलकर इन्हें कई इन्द्रियों के संकेत (आवाज़, चेहरा, जगह, शब्द) के साथ जोड़कर रखते हैं। इसलिए वो याद बहुत “ज़िंदा” लगती है। कई शोध बताते हैं कि नकारात्मक जानकारी हमारे निर्णय लेने, भावनाओं और याददाश्त पर सकारात्मक जानकारी की तुलना में 3 से 5 गुना अधिक प्रभाव डालती है।
Positive experiences – इन्हें हम अक्सर सतही तौर पर लेते हैं। क्योंकि हमें उनमें खतरा नहीं दिखता, इसलिए दिमाग गहराई से इन्हे कोड नहीं करता। सकारात्मक घटनाओं का संवेदी प्रोसेसिंग कम होता है, इसलिए Positive लोग या खुशियाँ जल्दी धुंधली पड़ जाती हैं।
यानी एक toxic व्यक्ति का एक कड़वा कमेंट हमें सालों तक चुभ सकता है, जबकि किसी करीबी की प्यारी बात कुछ हफ्तों में फीकी या धुंधली पड़ जाती है।
मानसिक स्वास्थ्य पर Toxic लोगों का प्रभाव
टॉक्सिक अनुभवों के बार-बार याद आने और दिमाग पर छा जाने का असर घातक होता है –
- डिप्रेशन, चिंता, कम आत्मसम्मान और सामाजिक अलगाव जैसी समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।
- ब्रेन में रक्त प्रवाह में कमी हो जाती है, जिससे सोचने की क्षमता और याददाश्त प्रभावित होती है।
- बच्चों, युवाओं और बुजुर्गों में ये तंत्रिका तंत्र के विकास को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है, जिसमें मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी शामिल हैं (Neurodevelopmental Issues) गुस्सा, और व्यक्तित्व डिसऑर्डर्स बढ़ सकते हैं।
- जिनके पास सपोर्ट सिस्टम कम है या बार-बार Abuse झेलना पड़ता है, उनमें मानसिक रोगों का खतरा बढ़ जाता है।
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Toxic रिश्तों में नेगेटिविटी बायस कैसे काम करता है
जब हम किसी toxic व्यक्ति के साथ रहते हैं, तो दिमाग का भावनात्मक सिस्टम लगातार सतर्क रहता है। ये एक reward–punishment cycle बनाता है:
| स्थिति | दिमाग की प्रतिक्रिया |
|---|---|
| जब वो व्यक्ति अच्छा बर्ताव करता है | Dopamine रिलीज़ होता है → खुशी मिलती है |
| जब वो अपमान या गुस्सा करता है | Cortisol रिलीज़ होता है → तनाव, डर पैदा होता है |
| दिमाग कहता है | “शायद अगली बार अच्छा होगा”- और हम वहीं टिके रहते हैं |
यही कारण है कि कई लोग toxic रिश्तों से बाहर आने के बाद भी उनकी यादों से मुक्त नहीं हो पाते। क्योंकि वो रिश्ता एक भावनात्मक रूप से गहराई से जुड़ा पैटर्न बन गया होता है, जिसमें प्यार और दर्द दोनों मिले होते हैं। दिमाग को ऐसे अनुभवों से “withdraw” होने में समय लगता है- जैसे किसी नशे से उबरने में समय लगता है।
भावनात्मक यादें और फ्लैशबैक
Toxic अनुभव सिर्फ दिमाग में नहीं, शरीर में भी दर्ज हो जाते हैं। एक मनोवैज्ञानिक Bessel van der Kolk ने अपनी किताब “The Body Keeps the Score” में बताया है कि ये सदमा सिर्फ मानसिक नहीं, बल्कि तंत्रिका संबंधी और शारीरिक भी होता है।
इसलिए जब हमें किसी toxic व्यक्ति की याद आती है: शरीर में वही तनाव लौट आता है, दिल की धड़कन बढ़ती है, नींद खराब होती है, और mood अचानक गिर जाता है। यानी दिमाग सिर्फ “याद” नहीं करता, बल्कि उन क्षणों को फिर से जीता है।
Negativity Bias के कारण हम सोचते हैं: “वो बुरा नहीं था, बस थोड़ा परेशान था।” “मैं उसे बदल सकता हूँ।” असल में यह दिमाग का एक सुधार लूप है- जो दर्द को समझने या कम करने की कोशिश करता है। लेकिन यही भ्रम हमें बार-बार उसी भावनात्मक जाल में खींच लाता है।क्योंकि हम “अंत” ढूँढ़ते हैं, जबकि toxic व्यक्ति “कन्फ्यूजन” पैदा करता है।
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भारतीय समाज और परिवारिक Toxicity:
भारतीय समाज में, रिश्ते और परिवार बड़ी ताकत हैं, लेकिन मजबूरी भी। अक्सर लोग सामाजिक दबाव, परंपरा या इज्ज़त की चिंता में टॉक्सिक रिश्तों को जीवन भर झेलते रहते हैं।
परिवार में किसी बुजुर्ग या प्रभावी सदस्य के द्वारा सबको कंट्रोल करना, तिरस्कार या आलोचना का माहौल बनाना हो सकता है। सामाजिक रीति-रिवाज, जाति, लिंग, सामाजिक स्टेटस भी कभी-कभी मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डालते हैं। रिश्तों की मजबूरी और Emotional Blackmail से लोग मदद मांगने में हिचकते हैं।
इससे निकलने का मनोवैज्ञानिक रास्ता
Negativity Bias को मिटाया नहीं जा सकता, लेकिन हम इसे फिर से समझ कर सही कर सकते हैं।
(1) Awareness: समझें कि यह दिमाग की प्रवृत्ति है। अपने आप को दोष न दें कि “मैं क्यों भूल नहीं पा रही/पा रहा।” दिमाग का काम है आपकी रक्षा करना”, और वो वही कर रहा है। खुद को पहचानें—अगर कोई व्यवहार बार-बार चोट पहुँचा रहा है, उसे नोटिस करें।
(2) Cognitive Reframing: जब toxic यादें लौटें, तो खुद से कहें- “यह दर्द मुझे याद दिलाता है कि मैं अब और यह बर्ताव नहीं झेलूँगी।” इससे दिमाग “खतरनाक यादों” को “learning memory” में बदल देता है।Boundaries बनायें: Toxic व्यक्तियों से Healthy Distance बनाएँ, अगर सम्भव हो।
(3) Gratitude Practice: हर दिन 3 सकारात्मक चीजें लिखिए – भले छोटी हों, लेकिन रोज़ाना ऐसा करने से दिमाग के hippocampus में सकारात्मक कोड मजबूत होते है।
(4) Mindfulness Meditation: जब बुरी यादें आएँ, बस observe करें — बिना जज किए, बिना रिएक्शन के। धीरे-धीरे emotional charge कम होने लगता है। योग, प्राणायाम, ध्यान: माइंडफुलनेस से ब्रेन केमिस्ट्री को बैलेंस करें।
(5) Healthy Emotional Replacement: Toxic व्यक्ति की जगह नए emotional experiences जोड़िए, जैसे nature walk, music, journaling, या supportive दोस्तों के साथ समय बिताना।धार्मिक पूजा, मंत्रजाप, सामूहिक भजन/कथा—Mental Support System बढ़ाते हैं।
दिमाग को व्यवस्थित करने के तरीके
“Neurons that fire together, wire together.” -Donald Hebb अर्थात, जो न्यूरॉन्स एक साथ सक्रिय होते हैं, वे आपस में तार जोड़ लेते हैं। जब भी हम किसी विचार, भावना या अनुभव को बार-बार दोहराते हैं, तो दिमाग के वही न्यूरॉन्स बार-बार एक साथ सक्रिय होते हैं।
धीरे-धीरे उनके बीच का संबंध मजबूत हो जाता है यानी वही सोच या आदत “स्थायी पैटर्न” बन जाती है।
इसलिए: हर बार जब आप toxic यादों में डूबते हैं, तो वही नेटवर्क मजबूत होता है और जब आप खुद को हीलिंग, करुणा या self-love पर केंद्रित करते हैं, तो दिमाग में नया तार बनता है।
Toxic अनुभवों के बाद कई लोग खुद को ही दोष देते हैं -“मुझे पहले समझ जाना चाहिए था,” “मैं इतना कमजोर क्यों पड़ा?” लेकिन याद रखिए, Negativity Bias के कारण दिमाग उस दर्द को बार-बार replay करता है, और खुद को दोष देने से वो और गहरा बन जाता है।
आप toxicity को भूल नहीं सकते, लेकिन उससे सीख निकालकर उसे growth energy में बदल सकते हैं।
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निष्कर्ष:
हम toxic या जहरीले लोगों को इसलिए याद रखते हैं क्योंकि हमारा दिमाग “ख़तरे को न भूलने” के लिए डिज़ाइन हुआ है। लेकिन इंसान होने का मतलब सिर्फ survive करना नहीं बल्कि उसे ठीक करना भी है। Negativity Bias हमें चेतावनी देता है, पर उसी में फँसे रहना ज़रूरी नहीं। जब हम अपने विचारों को सचेत रूप से दूसरी दिशा में ले जाते हैं तो दिमाग नई राहें बनाता है, और दिल धीरे-धीरे हल्का होने लगता है।
हमारे दिमाग में एक जन्मजात पूर्वाग्रह है, अपूर्ण भावनात्मक घटनाएं बार-बार दिमाग को उलझाती हैं, और सामाजिक-सांस्कृतिक मजबूरी भी इसकी वजह बनती है। लेकिन मनोवैज्ञानिक मदद, हेल्दी सीमाएं निर्धारित करने से, योग-ध्यान और सामाजिक सपोर्ट से हम इन घावों को भर सकते हैं, और अपने मन को स्वस्थ रख सकते हैं हैं।
याद रखें: “जिसे दिमाग डर कहता है, उसे दिल कभी-कभी सीख कहता है।” और यही सीख हमें toxicity से नहीं, आत्म-जागरूकता से जोड़ती है।
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