जब कोई हमें इग्नोर करे, तो हम और ज़्यादा आकर्षित क्यों हो जाते हैं?

क्योंकि जो चीज़ आसानी से न मिले, वही दिमाग को चाहिए होती है

जो कभी बात करे, कभी बिल्कुल चुप, दिमाग इस उतार-चढ़ाव में उलझ जाता है।

थोड़ी सी लिफ्ट मिलते ही मन खुश हो जाता है। और इग्नोर मिलते ही बेचैनी बढ़ जाती है।

हमारा ईगो चोट खा जाता है, मुझे ही क्यों अवॉयड किया जा रहा है?

जो हमें भाव नहीं दे रहा, उसी से भाव पाने की चाह बढ़ जाती है।

यह मनोवैज्ञानिक खिंचाव वास्तव में सच्चा आकर्षण नहीं होता, बल्कि भावनात्मक भ्रम  होता है।

इससे कैसे बचें !

जो इग्नोर करे उसे जाने देना ही सम्मानजनक रास्ता है।

ऐसा आकर्षण हमारे लिए घातक है, यह हमें खत्म कर देता है।

इग्नोर को प्यार मत समझिए। जागरूक बनिए।