कम बोलने वाले लोग अक्सर ज्यादा कॉन्फिडेंट क्यों नजर आते हैं?
हम अक्सर सोचते हैं- ज़्यादा बोलना मतलब ज़्यादा कॉन्फिडेंस, लेकिन असलियत कुछ और होती है
वो नहीं बोलते लेकिन उनकी बॉडी लैंग्वेज बोलती है। सीधा बैठना, शांत आंखें, धीमा और संतुलित मूवमेंट- यही असली कॉन्फिडेंस है
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चुप रहने से दिमाग को सोचने का मौका मिलता है। इससे फैसले सटीक होते हैं और गलतियां कम, जो कॉन्फिडेंस बूस्ट करता है।
शांत आत्मविश्वास, मतलब बिना शोर के अपनी क्षमता दिखाना। ऐसे लोग कम बोलते हैं लेकिन उनकी हर बात में वजन होता है।
ऐसे लोग फोकस्ड रहते हैं और लक्ष्य हासिल करते हैं। कम बोलना धैर्य और मजबूती का प्रतीक बनता है।
ज़्यादा बोलना दूसरों की मंज़ूरी पाने की चाह दिखाता है। जो अंदर से कॉन्फिडेंट होते हैं, उन्हें बाहरी तारीफ़ या मान्यता की ज़रूरत कम पड़ती है।
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कम बोलने वाले ज्यादा सुनते हैं, जिससे वे दूसरों को समझते हैं और उनके रिश्ते मजबूत होते हैं। लोग उनकी सलाह को वैल्यू देते हैं।
कम बोलने वाले राज़ रखते हैं और बेकार बकवास नहीं करते। लोग उन्हें भरोसेमंद मानते हैं, जो उनकी सेल्फ-रिस्पेक्ट बढ़ाता है।
वे बहस में नहीं उलझते, सोच-समझकर बोलते हैं। इससे उन्हें सम्मान खुद-ब-खुद मिलता है।
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कम बोलने वाले लोग कल्पनाशील, विश्लेषण करने में माहिर होते हैं। इसी वजह से वे अच्छे लेखक, मनोवैज्ञानिक, कलाकार या रणनीतिक सोच वाले बनते हैं।
कम बोलने से दुश्मन कम, सुकून ज्यादा होता है। यह मानसिक शांति ही उनके कॉन्फिडेंस का आधार बनता है।
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आज से कम बोलें, ज्यादा सुनें। रोज 15 मिनट साइलेंस प्रैक्टिस करें। कॉन्फिडेंस ऑटोमैटिक बढ़ेगा।
कम बोलना कमजोरी नहीं, ताकत है। शांत कॉन्फिडेंस अपनाकर जीवन बदलें। कॉन्फिडेंस आवाज़ नहीं, अहसास होता है।
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