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रात को शरीर थका होता है, फिर नींद क्यों नहीं आती?

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रात को शरीर थका होता है, फिर नींद क्यों नहीं आती?

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दिन भर शरीर को घसीटते हुए काम करना, शाम होते-होते आंखों में भारीपन आ जाना, और बिस्तर पर लेटते ही…नींद का गायब हो जाना। अगर आपके साथ भी ऐसा होता है कि शरीर थका है, लेकिन दिमाग जाग रहा है, तो आप अकेले नहीं हैं।

ये समस्या आज लाखों लोगों की है और दिलचस्प बात ये है कि यह शरीर के थकान की नहीं, दिमाग के बेचैनी की समस्या है। रात को थकान के बावजूद नींद न आना एक आम समस्या है, जिसे अनिद्रा कहते हैं। यह तनाव, जीवनशैली और जैविक कारणों से होता है।

इस लेख में हम समझेंगे- थके होने के बावजूद नींद क्यों नहीं आती और सबसे ज़रूरी- इससे बाहर निकलने के व्यावहारिक उपाय क्या हैं।

शरीर की थकान मतलब नींद की गारंटी?

हम बचपन से मानते आए हैं कि “जितना थकेंगे, उतनी अच्छी नींद आएगी” लेकिन सच्चाई यह है कि शारीरिक थकान नींद लाने में मदद कर सकती है लेकिन मानसिक उत्तेजना/सतर्कता नींद को पूरी तरह रोक देती है। अगर दिमाग खतरे की स्थिति में है, तो शरीर चाहे जितना थका हो – नींद नहीं आएगी।

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में लाखों लोग रात को बिस्तर पर लेटे-लेटे घंटों जागते रहते हैं। शरीर थक जाता है, आंखें भारी लगती हैं, लेकिन दिमाग शांत नहीं होता। डॉक्टर मैथ्यू वॉकर जैसे स्लीप एक्सपर्ट बताते हैं कि यह नींद की जैविक घड़ी (सर्कैडियन रिदम) बिगड़ने से होता है। परिणामस्वरूप थकान बढ़ती है, एकाग्रता कम होती है और स्वास्थ्य बिगड़ता है।

आखिर रात को दिमाग क्यों जाग जाता है? दरअसल दिन में शोर होता है, लोग होते हैं, काम होते हैं जबकि रात में शांति होती है, अंधेरा होता है, कोई भटकाव नहीं होता। यही वो समय है जब दबा हुआ दिमाग बोलने लगता है। जो बातें दिन में टाल दी जाती हैं: चिंता, डर, अधूरी बातें, इच्छाएं, भविष्य की अनिश्चितता वो सब रात को उभर आती हैं।

नींद की कमी और मानसिक तनाव के बीच सीधा सम्बन्ध

वैज्ञानिक कारण

शरीर थकने पर भी नींद न आने के पीछे कई वैज्ञानिक कारण हैं। सबसे बड़ा कारण सर्कैडियन रिदम (शरीर की आंतरिक जैविक घड़ी जो लगभग 24 घंटे के चक्र में काम करती है। यह नींद-जागने, हार्मोन रिलीज और अन्य शारीरिक प्रक्रियाओं को नियंत्रित करती है) का असंतुलन है, जो प्रकाश और अंधेरे से नियंत्रित होता है।

स्क्रीन की नीली रोशनी मेलाटोनिन (नींद के हार्मोन) को दबाती है, जो नींद लाने वाला होता है। दूसरा, कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) रात में ऊंचा रह जाता है, जो दिमाग को अलर्ट रखता है। थायरॉइड या डायबिटीज जैसी बीमारियां मेटाबॉलिज्म तेज कर देती हैं, जिससे आराम नहीं मिलता। न्यूरोसाइंस के अनुसार, दिमाग का डिफॉल्ट मोड नेटवर्क (DMN) रात में विचारों की बाढ़ लाता है, भले ही शरीर थका हो।

मनोवैज्ञानिक कारण

अनेक मनोवैज्ञानिक कारण है जो नींद में बाधक होते हैं, यहाँ कुछ मुख्य कारणों पर विस्तार से जानते हैं –

1. तनाव और चिंता

नींद ना आने के पीछे तनाव और चिंता प्रमुख वजहें हैं। ऑफिस की टेंशन या पारिवारिक कलह मन को बोझिल रखती है। डिप्रेशन में दिमाग रिलैक्स नहीं कर पाता, जिससे बेचैनी बढ़ती है। एंग्जायटी डिसऑर्डर वाले लोग रात में भविष्य की चिंता करते रहते हैं।

Anxiety का मतलब सिर्फ डर नहीं होता। चिंता का मतलब है: “दिमाग का लगातार अलर्ट मोड में रहना” Anxiety में दिमाग सोचता है- कुछ गलत हो सकता है, मुझे तैयार रहना चाहिए, आराम करना सुरक्षित नहीं है और जब दिमाग को खतरा लगता है, तो वह नींद को भी खतरे जैसा मानने लगता है।

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2. भावनात्मक थकान

सिर्फ हमारा शरीर नहीं थकता है, हमारी भावनाएं भी थकती हैं। हमेशा खुद को साबित करते रहना, सबको खुश रखने की कोशिश करते रहना, अपनी बात या भावनाएं दबाना- यह सब दिमाग पर एक भार जैसा बनाता है। और ऐसे भावनात्मक थकान में नींद आती नहीं या आती है तो टूट-टूट कर आती है।

3. बचपन का डर और बेचैनी

बहुत लोगों के लिए रात इसलिए भारी होती है क्योंकि बचपन में कोई डर रात से जुड़ा था, या घर का माहौल अस्थिर था, या नींद में भी सतर्क रहना पड़ा- इन सब बातों को दिमाग याद रखता है कि “रात सुरक्षित नहीं है।” भले ही आज हालात बदल गए हों, लेकिन nervous system अब भी पुराने चक्र में फंसा रहता है।

4. नींद के प्रति नेगेटिव सोच

इस तरह की सोच भी समस्या बढ़ाती है। “आज नींद नहीं आई तो कल क्या होगा?” जैसा विचार चक्र बन जाता है। स्लीप एक्सपर्ट कहते हैं, बिस्तर को सोने की जगह न मानकर जागने की जगह समझ लेना आम गलती है। सबसे खतरनाक स्थिति तब होती है जब “नींद न आने का डर, नींद से भी बड़ा हो जाता है” फिर दिमाग सोचता है- आज भी नींद नहीं आएगी, कल फिर दिन खराब होगा और यह डर खुद एक नई चिंता बन जाता है।

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जीवनशैली संबंधी कारण

हमारी गलत आदतें भी नींद चुराती हैं। दिन में कैफीन या भारी भोजन लेना पाचन को प्रभावित करता है। अनियमित सोने का समय बॉडी क्लॉक बिगाड़ता है- वीकेंड पर देर रात जागना हफ्ते भर असर डालता है। रात में कॉफ़ी या चाय नींद भगाती है।

मोबाइल फोन सिर्फ आंखों को नहीं थकाता, दिमाग को अति उत्तेजित करता है। लगातार जानकारी- रील, न्यूज़, मैसेज ये सब दिमाग को एक्टिव बनाये रहते हैं। रात को फोन देखने से दिमाग को “दिन खत्म” होने का संकेत नहीं मिलता, जिससे मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) कम बनता है। शारीरिक बेचैनी या दर्द, जैसे पैरों में रेस्टलेस लेग सिंड्रोम, थके शरीर को भी आराम नहीं देता। शाम को ज्यादा व्यायाम करने से अड्रेनालाईन हार्मोन बढ़ जाता है। जिससे नींद नहीं आती।

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इससे बाहर कैसे निकलें? (Practical Solutions)

नींद सुधारने के कुछ आसान तरीके अपनाएं।

1. नींद को ज़बरदस्ती मत बुलाइए

नींद आपका आदेश नहीं मानती। जितना ज़्यादा आप कहेंगे- “मुझे सोना है” “अब नींद आ जानी चाहिए” उतना ही दिमाग सतर्क होगा। नींद सुरक्षा और शांति महसूस होने पर आती है। बार-बार घड़ी मत देखिए- हर बार समय देखने से दिमाग को signal जाता है: “अब तो बहुत देर हो गई” और चिंता बढ़ जाती है। इसलिए घड़ी पलट दीजिए या फोन दूर रखिए।

2. दिन में 15 मिनट “सोचने का समय” दें

हमेशा प्रयास करें कि दिन में ही बैठकर, लिखकर या बोलकर अपनी चिंताओं को जगह दें। उन पर अच्छी तरह मनन कर लें ताकि रात को दिमाग को चिल्लाना न पड़े और चिंताए दिमाग को परेशान ना करें।

3. सोने से पहले नर्वस सिस्टम को शांत करें

अच्छी नींद के लिए ये उपाय मदद करते हैं: धीमी गहरी सांस (4-6 breathing) शरीर को हल्का स्ट्रेचिंग करना, सोने से पहले गुनगुना पानी या हल्दी दूध पीना। ये शरीर को बताते हैं कि “अब खतरा नहीं है।”पैरों की हल्की मालिश, शरीर को ढीला होने का मौका दें। व्यायाम दिन में करें, शाम को योग। अनुलोम-विलोम सर्कैडियन रिदम सेट करता है। सोने से 3 घंटे पहले वॉक करें।

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4. बिस्तर को “सोचने की जगह” न बनाएं

बिस्तर योजना बनाने के लिए, विश्लेषण करने के लिए नहीं है। अगर नींद न आए तो उठिए हल्की रोशनी में कुछ शांत काम कीजिए, फिर लौटिए बिस्तर पर। यदि 30 मिनट तक नींद न आए तो उठकर किताब पढ़ें, स्क्रीन न देखें। या फिर चुपचाप बिस्तर छोड़िए, हल्की रोशनी में बैठिए और कोई शांत काम कीजिए (किताब, भजन, धीमा संगीत) बिस्तर को सोचने की जगह मत बनाइए।

5. खुद से ये मत पूछिए “मेरे साथ ही क्यों?”

नींद की समस्या कोई कमजोरी नहीं, पागलपन नहीं है। यह संवेदनशील दिमाग का संकेत है। अगर आपका शरीर थका है और नींद नहीं आ रही, तो इसका मतलब है कि आपका दिमाग अभी भी किसी लड़ाई में फंसा है। और लड़ाइयां दबाने से नहीं, समझने, सुलझाने से खत्म होती हैं। नींद न आने को “आपदा” मत बनाइए।

6. नींद को आदत बनायें

रोज एक ही समय सोएं-उठें, इससे प्राकृतिक बॉडी क्लॉक सेट होती है। सोने से 1 घंटे पहले लाइट्स डिम करें, इससे मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) बढ़ेगा। कमरे का तापमान 18°-20°C रखें। लैवेंडर की खुशबू या व्हाइट नॉइज मशीन दिमाग को शांत करती है।

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7. आहार और पोषण

नींद के लिए सही खाना जरूरी है। बादाम, केला मैग्नीशियम देते हैं जिससे नींद अच्छी आती है। रात को हल्का भोजन करें- दाल, सब्जी, या खिचड़ी। चाय या कॉफ़ी शाम बाद न लें। पानी पर्याप्त मात्रा में पियें। ओमेगा-3 (मछली, अलसी) दिमाग शांत करता है। आयुर्वेद में अश्वगंधा तनाव कम करती है। ब्राह्मी चाय भी मदद करती है।

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नींद ना आये और भूख लगे तो ?

बहुत से लेट नाईट सोने वालों की यह समस्या है की उन्हें 12-1 बजे के बाद भूख लगती है। रात में भूख लगे तो क्या खा सकते हैं?

  • गुनगुना दूध (बिना चीनी) दूध में tryptophan होता है, जो नींद में मदद करता है चाहें तो:एक चुटकी हल्दी या थोड़ा सा जायफल (बहुत कम) मिला सकते हैं।
  • 1 केला- पोटैशियम और मैग्नीशियम मांसपेशियों को रिलैक्स करते हैं पेट भी शांत रहता है
  • मुट्ठी भर भुने चने / मखाने, ये हल्के होते हैं, पेट भरने का एहसास देते हैं
  • ओट्स का पतला दलिया (नमक या दूध के साथ) अगर भूख सच में ज़्यादा हो और खाली पेट नींद नहीं आ रही हो।
  • भीगे बादाम (2–3) मैग्नीशियम चिंता को थोड़ा शांत करता है
  • कैमोमाइल चाय एक हर्बल चाय है जो फूलों से बनती है और नींद व तनाव कम करने के लिए जानी जाती है।
  • सौंफ / अजवाइन का गुनगुना पानी पेट और दिमाग दोनों को शांत करता है
  • रात में भूख लगे तो ये चीज़ें न खाएं- चाय / कॉफी, बिस्कुट, नमकीन, चिप्स, मीठा (चॉकलेट, मिठाई)

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निष्कर्ष

छोटे बदलाव से नींद लौटेगी। धैर्य रखें, ट्रैक करें। स्वस्थ नींद आपका जीवन बदल देगी। नींद कोई luxury नहीं है। यह शरीर का प्राकृतिक अधिकार है। जैसे-जैसे आप खुद को सुरक्षित महसूस कराएंगे, अपनी चिंता को सुना हुआ महसूस कराएंगे, वैसे-वैसे नींद आपकी ओर लौटना शुरू कर देगी। धीरे- बिना ज़ोर लगाए।

एक राहत देने वाली सच्चाई: अगर आज नींद नहीं आई, तो इसका मतलब यह नहीं कि आपको हमेशा यही समस्या रहेगी। अक्सर नींद तब लौटती है, जब हम उसे पकड़ने की कोशिश छोड़ देते हैं।

उम्मीद है आपके लिए ये लेख बहुत कारगर सिद्ध होगा। इसे अपने उन परिचितों तक पहुचायें जो नींद की कमी से जूझ रहे है। 

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