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हर समय रील्स देखने की आदत दिमाग पर क्या असर डालती है?

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हर समय रील्स देखने की आदत दिमाग पर क्या असर डालती है?

Reels psychological effectपिछले कुछ वर्षों में इंस्टाग्राम रील्स, यूट्यूब शॉर्ट्स, फेसबुक रील्स और TikTok जैसे शॉर्ट-फॉर्म कंटेंट प्लेटफ़ॉर्म्स ने लोगों की ज़िंदगी में गहरा असर डाला है। आज हर उम्र का व्यक्ति दिन में कई बार इन छोटे-छोटे वीडियोज़ को स्क्रॉल करता है।

यह मनोरंजन, जानकारी और समय बिताने का एक आसान साधन बन गया है। लेकिन मनोविज्ञान की दृष्टि से देखें तो यह आदत सिर्फ़ मनोरंजन तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे दिमाग़, ध्यान, भावनाओं और रिश्तों पर गहरा प्रभाव डाल रही है खासकर युवा पीढ़ी पर।

इस ब्लॉग में हम विस्तार से समझेंगे कि Reels/Shorts देखने की आदत हमें क्यों लगती है, इसका मानसिक स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है तथा इससे बचने का क्या तरीका हो सकता है।

Reels/Shorts क्यों आकर्षित करते हैं- मनोवैज्ञानिक आधार

1. डोपामिन का असर

जब हम कोई रील देखते हैं, खासकर मज़ेदार, जानकारीपूर्ण या चौंकाने वाली, तो दिमाग़ में डोपामाइन हार्मोन रिलीज़ होता है। यह “feel-good” न्यूरोट्रांसमीटर है, जो हमें अच्छा महसूस कराता है और ज्यादा देखने के लिए प्रेरित करता है।

2. अनिश्चित पुरस्कार प्रणाली

हर बार जब हम नई रील देखते हैं, तो हमें नहीं पता कि वह कितनी मज़ेदार होगी। यह slot machine जैसा अनुभव देता है। कभी Reel बहुत अच्छी लगती है, कभी औसत, लेकिन यही “अनिश्चितता” हमें लगातार स्क्रॉल करने पर मजबूर करती है।

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3. कम समय में संतुष्टि

रील्स 15 से 60 सेकंड की होती हैं। हमारे दिमाग़ को तुरंत कंटेंट और संतुष्टि मिल जाती है। यह तात्कालिक संतुष्टि हमें लंबी वीडियो देखने की बजाय छोटे वीडियो चुनने पर मजबूर करता है।

4. कुछ छूट जाने का डर (FOMO)

FOMO यानी “Fear of Missing Out” एक मनोवैज्ञानिक स्थिति है, जिसमें व्यक्ति को हमेशा यह डर या चिंता बनी रहती है कि कहीं वह कोई ज़रूरी जानकारी, मज़ा, ट्रेंड या अवसर को मिस न कर दे। इसलिए वह सोशल मीडिया पर लगा रहता है। Reels/Shorts के संदर्भ में इसका मतलब है: “सब लोग यह ट्रेंडिंग रील देख रहे हैं, मुझे भी देखनी चाहिए।” “अगर मैंने यह  वीडियो मिस कर दिया तो मैं जानकारी में पीछे रह जाऊँगा।”

Reels/Shorts का सकारात्मक प्रभाव

हालाँकि अक्सर इनके नकारात्मक पहलू पर बात होती है, लेकिन सही तरीके से उपयोग करने पर Reels/Shorts के कुछ फायदे भी हैं:

1. तेज़ी से सीखना

  • छोटे-छोटे शैक्षणिक वीडियोज़ से नई जानकारी जल्दी मिलती है।
  •  कुकिंग, डाई, भाषा सीखना, मनोवैज्ञानिक टिप्स आदि को रील्स के माध्यम से सरलता से सीखा जा सकता है।

2. मनोरंजन और तनाव कम करना

  • दिनभर के तनाव के बाद हल्की-फुल्की रील्स मूड को बेहतर बना सकती हैं।
  •  हास्य और संगीत वाले कंटेंट से सेरोटोनिन और एंडोर्फिन हार्मोन रिलीज़ होते हैं, जो मूड को अच्छा करते हैं।

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3. रचनात्मकता

  • रील्स लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मंच देती हैं।
  • डांस, एक्टिंग, आर्ट, मिमिक्री करके लोग अपनी creativity को दिखा पाते हैं।

4. संपर्क और समुदाय

  •  समान रुचियों वाले लोग आपस में आसानी से जुड़ जाते हैं।
  •  कम्युनिटी बिल्डिंग और जागरूकता फैलाने का यह एक शक्तिशाली साधन है।

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Reels/Shorts का नकारात्मक प्रभाव

निःसंदेह नकारात्मक प्रभावों की सूची ज्यादा बड़ी है क्योकि बहुत कम लोग हैं जो रील्स का सही ढंग से उपयोग करते हैं।

(A) ध्यान और सोच पर असर

1. ध्यान की अवधि कम होना
  • लगातार तेज़ गति से बदलते कंटेंट के कारण attention span (ध्यान की अवधि) छोटी होती जाती है। वर्किंग मेमोरी कमजोर हो जाती है क्योंकि ब्रेन इनपुट को गहराई से प्रोसेस नहीं कर पाता।
  • लगातार छोटे-छोटे वीडियो देखने से हमारा दिमाग़ “fast switching” मोड में आ जाता है। परिणामस्वरूप, किताब पढ़ने या लंबा लेख सुनने में मुश्किल होती है।
  • शोध बताते हैं कि साल 2000 में औसत attention span 12 सेकंड था, आज यह 8 सेकंड रह गया है, और Reels/shorts इसे और घटा रही हैं। ये बेहद चिंताजनक है।
2. उथली/कमजोर सोच
  • गहरे और जटिल विषयों को समझने की क्षमता प्रभावित होती है क्योंकि दिमाग़ छोटी-छोटी जानकारियों का आदी हो जाता है।
  • ब्रेन इमेजिंग स्टडीज़ से पता चला कि बार-बार ‘रील’ देखने से दिमाग की रिवॉर्ड पाने की neural pathways मजबूत होती हैं और फैसले लेने की क्षमता कमज़ोर हो जाती है।

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(B) भावनाओं और आत्म-सम्मान पर असर

1. तुलना और ईर्ष्या
  • ग्लैमरस लाइफ स्टाइल या सफलता देखकर लोग अपनी जिंदगी से असंतुष्ट हो जाते हैं।
  • यह तुलना की थ्योरी को दर्शाता है, जिसमें हम खुद की तुलना दूसरों से करते हैं और नकारात्मक भावनाएँ अनुभव करते हैं।
2. शारीरिक छवि की समस्या
  • रील्स में ज़्यादातर यूजर्स अपनी ज़िंदगी के खास, संपादित और आदर्श पल ही दिखाते हैं, जिससे आम दर्शकों का आत्ममूल्य कम हो सकता है (“हाइलाइट रील सिंड्रोम”)।
  •  फ़िल्टर और एडिटेड वीडियोज़ से असली और नकली सुंदरता की सीमा धुंधली हो जाती है।
  •  युवाओं में अपने शरीर से असंतुष्टि और चिंता बढ़ती है। मूड खराब होता है।

(C) व्यवहार और रिश्तों पर असर

1. लत लगना
  • “बस पाँच मिनट” सोचकर शुरू की गई स्क्रॉलिंग कई घंटे ले लेती है।
  •  इसे व्यवहार का एडिक्शन कहा जाता है, जो गेमिंग या जुए की लत जैसी होती है।
2. रिश्तों में दूरी
  • परिवार या दोस्तों के साथ समय बिताने की बजाय लोग फोन पर Reels देखते रहते हैं, जिससे सामाजिक दूरी बढ़ती है।
  • शॉर्ट वीडियो की लत से आम जीवन की जिम्मेदारियाँ, रिश्ते, और सामाजिक सहभागिता प्रभावित होती है।
  • परिवार में संवाद में कमी, बच्चों या पार्टनर की उपेक्षा जैसे लक्षण देखे गए हैं।
  • Reels देखने में समय इतना निकल जाता है कि पढ़ाई, काम या घरेलू जिम्मेदारियाँ प्रभावित होती हैं।

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 (D) Reels/Shorts का बच्चों-किशोरों पर असर

बच्चों में:

बहुत अधिक Reels और छोटे वीडियो देखने से पढ़ाई में ध्यान लगाने में कठिनाई हो सकती है। बच्चे किसी काम या विषय में लंबे समय तक रुचि नहीं रख पाते और जल्दी बोर महसूस करने लगते हैं। कुछ मामलों में चिड़चिड़ापन, गुस्सा या आक्रामक व्यवहार भी बढ़ सकता है।

किशोरों में:

किशोरावस्था में बच्चे अपनी पहचान और व्यक्तित्व को समझने की कोशिश कर रहे होते हैं। सोशल मीडिया पर दूसरों की जीवनशैली, रूप-रंग और उपलब्धियों को देखकर वे खुद की तुलना करने लगते हैं, जिससे आत्मविश्वास कम हो सकता है। कई किशोर अपने शरीर या दिखावट को लेकर असंतुष्ट महसूस करने लगते हैं। इसके अलावा ऑनलाइन मज़ाक, अपमानजनक टिप्पणियों या परेशान करने वाले संदेशों (साइबर बुलिंग) का शिकार होने का जोखिम भी बढ़ जाता है, जिसका असर उनके मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

1. व्यसनी व्यवहार के संकेत:
  • Reels देखना रोकने में असमर्थता
  • ज़िम्मेदारियों, नींद या निजी देखभाल की अनदेखी
  • मोबाइल या इंटरनेट उपयोग छुपाना
  • चिड़चिड़ापन व सामाजिक अलगाव
  • पढ़ाई या कामकाज में गिरावट

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Reels/Shorts का मानसिक स्वास्थ्य पर प्रभाव

  • कई स्टडीज़ से स्पष्ट है कि Reels/Shorts के ज्यादा देखने से चिंता, अवसाद और खुद की तुलना–संस्कृति की प्रवृत्ति में इज़ाफा हुआ है।
  • Harvard Business Review में प्रकाशित एक अध्ययन बताता है कि जो लोग रोज़ 1 घंटे से ज़्यादा समय Reels/Shorts पर बिताते हैं, उनमें चिंता और डिप्रेशन का स्तर बढ़ जाता है।
  • लगातार डोपामिन हिट से ब्रेन रीवार्ड सिस्टम की संवेदनशीलता घट जाती है, जिससे व्यक्ति और ज्यादा उत्तेजना की तलाश करने लगता है।
  • नींद की गुणवत्ता पर भी इसका नकारात्मक प्रभाव पड़ता है; नींद न आना, थकावट व पढ़ाई में कमी आम लक्षण हैं।
  • Journal of Behavioral Addictions (2022) के अनुसार, TikTok और Instagram Reels जैसी प्लेटफॉर्म्स का अधिक इस्तेमाल करने वाले युवाओं में नींद की कमी, अकेलापन और आक्रामक /उत्तेजक व्यव्हार ज़्यादा पाया गया।

 युवा और किशोर क्यों ज्यादा संवेदनशील

  • 13–25 वर्ष के युवा, जिनका मस्तिष्क विकास और आत्मनियंत्रण पूरी तरह नहीं हुआ होता, वे शॉर्ट-फॉर्म वीडियो की लत के ज्यादा शिकार होते हैं।
  • यह उम्र सोशल अनुमोदन, साथियों से तुलना और नयापन चाहने की अधिकता के लिए जानी जाती है।
  • शोध से पता चलता है कि लंबे समय तक देखकर युवाओं – खासतौर पर लड़कियों – में अपने शरीर या जीवन से असंतोष की भावना बढ़ती है, जो डिप्रेशन, इटिंग डिसऑर्डर और आत्मसम्मान में गिरावट से जुड़ा है।
  • ध्यान और सेल्फ कंट्रोल में कमी, निर्णय लेते समय नुकसान की चिंता कम हो जाना, जिससे रिस्की फैसले बढ़ सकते हैं, मानसिक स्वास्थ्य विकारों का बढ़ना जो की आजकल किशोरों में आम समस्या होने लगी है।

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Reels/Shorts का संतुलित उपयोग – समाधान

यह विषय इतना गहरा और व्यापक है कि इसका असर न केवल व्यक्तिगत मानसिक स्वास्थ्य, बल्कि सामाजिक ढांचे और तकनीकी विकास की दिशा को भी प्रभावित करता है। ऐसे में सिर्फ व्यक्तिगत जागरूकता ही नहीं, बल्कि सामुदायिक और नीति-निर्माण स्तर पर भी सक्रियता ज़रूरी है।

1. Time Boundaries तय करें:

  • Screen Time Tracker या टाइमर का उपयोग करें।
  • रोज़ 30–40 मिनट से अधिक Reels न देखें।

2. Mindful Watching अपनाएँ:

  • बेवजह स्क्रॉल करने की बजाय उद्देश्यपूर्ण कंटेंट चुनें।
  •  शैक्षिक और प्रेरणादायक कंटेंट देखें।

3. Digital Detox करें:

  •  हफ्ते में एक दिन बिना Reels/Shorts बिताएँ।
  •  इसकी जगह किताबें, आउटडोर एक्टिविटी या मेडिटेशन करें।

4. रात को Reels न देखें:

  •  सोने से पहले शॉर्ट वीडियो देखने से नींद की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

5. Positive Content बनाइए और देखिए:

– अगर आप क्रिएटर हैं तो अर्थपूर्ण और शिक्षा से सम्बंधित कंटेंट बनाएँ।
– देखने वाले भी सावधान होकर ऐसा कंटेंट चुनें, जो आपके मूड और ज्ञान को बेहतर करे।

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रील्स के प्रमुख प्रकार और उनके मनोवैज्ञानिक प्रभाव

रील्स या शॉर्ट वीडियोस के विविध प्रकार और हर किस्म के कंटेंट के मनोवैज्ञानिक प्रभावों पर चर्चा जरूरी है, क्योंकि हर श्रेणी का अपना अलग प्रभाव, भ्रम और नुकसान सामने आ रहा है। हर Reel का असर समान नहीं होता। यह इस बात पर निर्भर करता है कि हम किस तरह का कंटेंट देख रहे हैं। शोध और हालिया समाजिक घटनाओं के आधार पर, रील्स के सबसे चर्चित प्रकार और उनके दुष्प्रभाव नीचे दिए जा रहे हैं:

1. ब्यूटी टिप्स/फैशन रील्स

  • आकर्षक और ‘परफेक्ट’ लुक्स पर आधारित वीडियो आत्म-मूल्य में कमी और शारीरिक असंतोष को बढ़ावा देते हैं।
  • किशोर उम्र की लड़कियाँ/लड़के बार-बार दूसरों से अपनी तुलना करते हैं, जिससे आत्म-विश्वास गिर जाता है और ‘कॉम्प्लेक्स’ पनपता है।
  • सबकी अलग अलग बनावट और स्किन होती है। एक फार्मूला हर किसी पर लागू नहीं हो सकता।

2. वल्गैरिटी/हॉट कंटेंट

  • अश्लील कंटेंट, बोल्ड पोज़ और विवादित विषय पर बनी रील्स कम उम्र बच्चों-युवाओं के मानसिक विकास में नकारात्मक सोच भरती हैं।
  • सस्ती लोकप्रियता के लिए बनाए जा रहे ऐसे वीडियो समाज में नैतिक और भाषा-संस्कृति का क्षरण कर रहे हैं; कपड़े, व्यवहार और सीमाओं को लेकर भ्रम बढ़ रहा है।
  • युवाओं में गलत धारणाएँ और अस्वस्थ sexual attitudes विकसित हो सकते हैं

3. एक्सरसाइज़/फिटनेस रील्स

  • फिटनेस टिप्स, एक्सरसाइज़ या ‘बॉडी गोल्स’ दिखाने वाली रील्स, कई बार अव्यावहारिक या खतरनाक हो सकती हैं।
  • बिना विशेषज्ञता देखे पीछा करने पर युवाओं/किशोरों में फ़िजिकल इंजरी, खाने-पीने की गड़बड़ियाँ, या ‘बॉडी डिसमॉर्फिया’ बढ़ सकता है। गलत तकनीक देखने से चोट का खतरा।
  • “मैं इतना fit क्यों नहीं हूँ?” मेरी बॉडी ऐसी क्यों नहीं है” जैसी सोच से मानसिक दबाव।

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4. वास्तु/ज्योतिष/अंधविश्वास संबंधित रील्स

  • बिना वैज्ञानिक तर्क के घर-ऑफिस के वास्तु सुझाव या तंत्र-टोटके वाली रील्स अक्सर लोगों में भ्रम, डर और चिंता को बढ़ा देती हैं।
  • यह “quick-fixes” पर भरोसा बढ़ाती है, जिससे तर्कशीलता कम होती है और सही प्रयास का विकल्प नहीं मिल पाता।
  • रोज़मर्रा के निर्णय (जैसे घर में कौन-सा रंग लगाना चाहिए या किस दिशा में सोना चाहिए) को लेकर अनावश्यक डर और असुरक्षा
  • विवेकपूर्ण चिंतन में कमी, वैज्ञानिक सोच की जगह अंधविश्वास बढ़ सकता है।

5. लाइफस्टाइल व फूड हैबिट्स

  • डायटिंग, ट्रेंडी फूड, “डिटॉक्स”, महंगे होटल/रैस्टोरेंट्स दिखाने वाली रील्स इर्रेशनल खर्च और असंतोष की भावना बढ़ाती हैं।
  • अपनी आर्थिक स्थिति की तुलना दूसरों से करने पर तनाव और असंतुष्टि होती है।
  • यह मानना कि खुशियाँ केवल महंगी चीज़ों से मिलेंगी। यह एक भ्रम है जो तेजी से फ़ैल रहा है। खर्च करने की आदतें बिगड़ना
  • बॉडी शेमिंग और अवास्तविक फूड ट्रेंड्स से लोग खाने की आदतों में असंतुलन का शिकार हो जाते हैं। इसका नतीजा कभी बहुत कम खाना तो कभी ज़रूरत से ज़्यादा खाना के रूप में सामने आता है।

6. मोटिवेशनल और शिक्षाप्रद रील्स

  • मोटिवेशन का ओवरडोज़: लगातार motivation सुनकर भी एक्शन न लेने से अपराधबोध और कुंठा होती है।
  • आधी अधूरी जानकारी से गलत निर्णय लेना।
  • अवास्तविक बातें भ्रम फैलाती हैं। इनसे कन्फूजन ज्यादा होता है।

7. फेक न्यूज़/भ्रामक जानकारी

  • रील्स पर तेजी से फैलने वाली अधूरी, मनगढंत या सनसनीखेज सूचनाएँ समाज और युवा वर्ग में भय, अनिश्चितता और भ्रांति का माहौल निर्मित करती हैं।
  • ऐसी भ्रामक जानकारी का सीधा असर फैसले लेने की क्षमता, तर्कवान सोच और सामाजिक व्यवहार पर होता है।

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निष्कर्ष

Reels और Shorts हमारे समय का अभिन्न हिस्सा बन चुके हैं। ये हमें ज्ञान, मनोरंजन और रचनात्मकता प्रदान कर सकते हैं, लेकिन इनका अति प्रयोग ध्यान, भावनाओं और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यह समझना ज़रूरी है कि छोटी-छोटी खुशियाँ भी बड़ी कीमत ले सकती हैं, अगर उनका संतुलन न रखा जाए।
इसलिए, Reels/Shorts का उपयोग संतुलित, सचेत और उद्देश्यपूर्ण ढंग से करना ही सबसे अच्छा विकल्प है।

FAQ (अक्सर पूछे जाने वाले सवाल)

1. क्या ज्यादा Reels देखने से ध्यान भटकने की समस्या हो सकती है?

हाँ, लगातार छोटे और तेज़ वीडियो देखने से दिमाग को बार-बार नए कंटेंट की आदत पड़ सकती है। इससे लंबे समय तक किसी एक काम पर ध्यान केंद्रित करना कठिन लग सकता है।

2. क्या Reels देखने से डोपामिन प्रभावित होता है?

Reels जैसे तेज़ और मनोरंजक कंटेंट दिमाग में डोपामिन रिलीज़ को बढ़ावा दे सकते हैं। यही कारण है कि कई लोगों को बार-बार फोन चेक करने या लगातार स्क्रॉल करने की इच्छा होती है।

3. क्या Reels की लत मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है?

अत्यधिक Reels देखने की आदत तनाव, चिंता, चिड़चिड़ापन, FOMO (Fear of Missing Out) और नींद की समस्याओं से जुड़ी हो सकती है। हालांकि इसका प्रभाव व्यक्ति की आदतों और उपयोग के समय पर निर्भर करता है।

4. क्या रात में Reels देखना नींद के लिए नुकसानदायक है?

हाँ, सोने से पहले लंबे समय तक मोबाइल स्क्रीन देखने और लगातार वीडियो देखने से नींद आने में देरी हो सकती है तथा नींद की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

5. क्या बच्चों और किशोरों पर Reels का प्रभाव अधिक पड़ता है?

बच्चों और किशोरों का मस्तिष्क अभी विकसित हो रहा होता है, इसलिए अत्यधिक स्क्रीन टाइम उनकी एकाग्रता, पढ़ाई की आदतों और भावनात्मक स्वास्थ्य पर अधिक प्रभाव डाल सकता है।

6. Reels देखने का सुरक्षित समय कितना होना चाहिए?

इसके लिए कोई एक निश्चित समय सीमा नहीं है, लेकिन विशेषज्ञ आमतौर पर स्क्रीन टाइम को संतुलित रखने, नियमित ब्रेक लेने और आवश्यक कार्यों को प्राथमिकता देने की सलाह देते हैं।

7. क्या Reels पूरी तरह नुकसानदायक हैं?

नहीं, Reels पूरी तरह नुकसानदायक नहीं हैं। शैक्षिक, प्रेरणादायक और उपयोगी जानकारी देने वाले वीडियो लाभदायक हो सकते हैं। समस्या तब होती है जब इनका उपयोग अत्यधिक या अनियंत्रित हो जाए।

8. Reels देखने की आदत कम करने के लिए क्या करें?

स्क्रीन टाइम लिमिट सेट करें, नोटिफिकेशन कम करें, सोने से पहले मोबाइल उपयोग सीमित करें, ऑफलाइन गतिविधियों में समय दें और सोशल मीडिया से नियमित ब्रेक लेने की कोशिश करें।

9. क्या लगातार Reels देखने से याददाश्त पर असर पड़ सकता है?

कुछ शोध बताते हैं कि अत्यधिक डिजिटल कंटेंट और लगातार सूचना की बौछार से जानकारी को लंबे समय तक याद रखने और गहराई से समझने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।

10. कैसे पहचानें कि Reels देखने की आदत समस्या बन रही है?

यदि आप काम, पढ़ाई या परिवार के समय में भी बार-बार Reels देखते हैं, स्क्रीन टाइम नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं, या मोबाइल न मिलने पर बेचैनी महसूस होती है, तो यह अस्वस्थ आदत का संकेत हो सकता है।

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