ऑटोफैगी क्या है? क्यों चर्चा में आया ये हेल्थ ट्रेंड

आजकल सोशल मीडिया पर “ऑटोफैगी (Autophagy)” शब्द बहुत सुनने को मिल रहा है। खासकर तब से जब बॉलीवुड एक्ट्रेस सोनाली बेंद्रे ने एक इंटरव्यू में बताया कि कैंसर के दौरान उन्हें ऑटोफैगी के बारे में बताया गया था और इसे उन्होंने अपनी हीलिंग जर्नी का हिस्सा बनाया।
लेकिन असल में ऑटोफैगी है क्या? ऑटोफैगी का मतलब है शरीर का खुद अपने अंदर जमा कचरा साफ करना। इसे आप शरीर का नेचुरल क्लीनिंग सिस्टम भी कह सकते हैं।
क्या यह वाकई शरीर को फायदा पहुँचाती है? क्या इसे फास्टिंग से बढ़ाया जा सकता है? यह रोगों के निस्तारण में कितनी कारगर हो सकती है ?आइए इसे बेहद आसान भाषा में समझते हैं।
ऑटोफैगी क्या है?
Auto का अर्थ है स्वयं, और Phagy का मतलब है खाना/निगलना, मतलब शरीर का खुद को खाना। यानी शरीर की कोशिकाएँ (cells) अपने अंदर के पुराने, खराब या मर चुके हिस्सों को “खाकर” स्वयं साफ करती हैं। आटोफैगी एक प्राकृतिक और महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसमें हमारा शरीर अपनी ही पुरानी, खराब या फालतू कोशिकाओं को तोड़कर उन्हें नष्ट करता है और उनसे मिलने वाले पोषक तत्वों का इस्तेमाल नई कोशिकाओं को बनाने में करता है।
इसे शरीर का “सेल्फ-ईटिंग” सिस्टम भी कहा जाता है, जो शरीर को स्वस्थ रखने और खुद को रोगों से लड़ने में सक्षम बनाता है। आटोफैगी का मतलब है “स्वयं को खाना” यानी अपनी क्षतिग्रस्त सामग्री को साफ करना। जिस तरह हम घर की सफाई करते हैं, पुराने सामान हटाते हैं, टूटी चीजें फेंकते हैं — ठीक उसी तरह शरीर भी सेल लेवल पर खुद को साफ करता है। यही ऑटोफैगी है।
शरीर को ऑटोफैगी की ज़रूरत क्यों है?
हमारा शरीर रोज़ सैकड़ों तरह के काम करता है- ऊर्जा बनाना, टॉक्सिन हटाना, सेल रिपेयर करना, नई कोशिकाएँ बनाना आदि।
इस दौरान कई खराब प्रोटीन, पुराने सेल, और टॉक्सिन जमा हो जाते हैं। अगर यह जमा कचरा साफ न किया जाए, तो शरीर में:-थकान, सूजन, बीमारियाँ, उम्र जल्दी दिखना, मेटाबॉलिज़्म स्लो, वजन बढ़ना जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं।
आटोफैगी इन्हीं खराब कोशिकाओं को पहचानकर, उन्हें नष्ट कर देती है और शरीर को स्वस्थ रखने में मदद करती है। इस प्रक्रिया से शरीर के इम्यून सिस्टम यानी रोग प्रतिरोधक क्षमता को भी मजबूती मिलती है और ऊर्जा की बचत होती है। यह शरीर को दीर्घायु बनाने और कई बीमारियों से बचाव करने में मददगार होती है। इसलिए शरीर अपनी सुरक्षा के लिए समय-समय पर खुद की सफाई (ऑटोफैगी) करता रहता है।
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ऑटोफैगी कैसे होती है?
आटोफैगी तब ज्यादा सक्रिय होती है जब हम भूखे रहते हैं या फास्टिंग करते हैं, या जब शरीर को तनाव या संक्रमण होता है। इसका मतलब है कि जब भोजन कम मिलता है, तो हमारा शरीर खुद ही पुरानी कोशिकाओं को तोड़कर उनसे पोषक तत्व निकालता है और नई कोशिकाएं बनाता है।
सीधे शब्दों में यह तब शुरू होती है जब शरीर को बाहर से खाना नहीं मिल रहा होता- जैसे: 12–16 घंटे का हल्का उपवास, शरीर पर हल्का-मध्यम व्यायाम, कैलोरी थोड़ा कम होना, देर रात खाना न खाना
इन स्थितियों में शरीर सोचता है: “ऊर्जा बाहर से नहीं मिल रही, तो अंदर जमा खराब चीजें उपयोग करो।” तभी सेल के अंदर “क्लीनिंग टीम” एक्टिव हो जाती है और पुरानी/खराब चीजों को तोड़कर ऊर्जा बनाती है। इसे ही ऑटोफैगी कहते हैं।
सोनाली बेंद्रे ने ऑटोफैगी का नाम क्यों लिया?
बॉलीवुड अभिनेत्री सोनाली बेंद्रे ने 2018 में कैंसर का सामना किया था। उन्होंने बताया कि उनके कैंसर इलाज के दौरान उन्होंने नेचुरोपैथी (प्राकृतिक चिकित्सा) और आटोफैगी की प्रक्रिया को अपनाया था, जिससे उनकी सेहत में सुधार हुआ। सोनाली ने इस प्रक्रिया को “सेल्स का रीसाइक्लिंग सिस्टम” बताते हुए कहा कि यह शरीर को ठीक करने में मदद करता है। उन्होंने कहा कि फास्टिंग और ऑटोफैगी को समझने से उन्हें हीलिंग में मदद महसूस हुई।
हालांकि, विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया है कि आटोफैगी अकेले कैंसर का इलाज नहीं है, लेकिन यह एक सहायक प्रक्रिया हो सकती है जो शरीर की सेलुलर सेहत को बेहतर बनाती है। सोनाली का यह अनुभव सोशल मीडिया पर चर्चा में रहा।
सोनाली बेंद्रे ने अपने कैंसर अनुभव में बताया कि: “मैं डॉक्टर नहीं हूँ, बस अपना अनुभव साझा कर रही हूँ।” उनका उद्देश्य आसान भाषा में अपनी हेल्थ जर्नी शेयर करना था। लेकिन उन्होंने कभी नहीं कहा कि यह कैंसर का इलाज है। डॉक्टर्स ने भी यह स्पष्ट किया है कि ऑटोफैगी शरीर के लिए फायदेमंद प्रक्रिया है, लेकिन इसे किसी गंभीर बीमारी का “इलाज” नहीं कहा जा सकता।
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ऑटोफैगी से क्या फायदे होते हैं?
ऑटोफैगी शरीर को सेल लेवल पर दुरुस्त करता है। मतलब शरीर में जमा खराब कोशिकाओं को साफ करती है। इसके प्रमुख फायदे:
1. उम्र धीमी लगती है (Anti-Aging)
जब शरीर की खराब कोशिकाएँ साफ होती हैं तो फिर नई कोशिकाएँ बनती हैं। इससे त्वचा, बाल, शरीर सबमे नयापन लगता है। यह इम्यून सिस्टम को मजबूत करती है और संक्रमण से लड़ने में मदद करती है।
2. वजन कम करने में सहायता
भोजन न मिलने पर शरीर अपने अंदर के जमा फैट का उपयोग करता है, अर्थात उसे खाने लगता है, जिससे वज़न घटता है।
3. शरीर में सूजन (Inflammation) कम
पुरानी खराब चीजें हटने से शरीर में सूजन कम होती है। हमारे शरीर में सूजन तभी बढ़ती है जब: कोशिकाएँ खराब हो जाती हैं, उनमें कचरा जमा हो जाता है, ऑटोफैगी इन खराब कोशिकाओं को तोड़कर साफ करती है। इससे सूजन घटने लगती है।
4. दिमाग तेज
खराब brain cells की सफाई से दिमाग तरोताजा होता है। इससे मानसिक थकान कम होता है और ध्यान, निर्णय क्षमता तथा काम में फोकस बढ़ता है।
5. लाइफस्पैन बढ़ने की संभावना
लंबे समय तक सेल्स स्वस्थ रहने से उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है। यह शरीर के लिए एक प्रकार का हीलर है जो उसे स्वस्थ और जवान बनाता है।
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ऑटोफैगी कब शुरू होती है?
यह हर व्यक्ति के शरीर पर निर्भर करता है, लेकिन सामान्य तौर पर:
- 12–14 घंटे: हल्की ऑटोफैगी शुरू
- 16–18 घंटे: अच्छी ऑटोफैगी
- 24+ घंटे: डीप ऑटोफैगी
लेकिन ध्यान रखें- बहुत लंबे उपवास (24+ घंटे) बिना डॉक्टर के जोखिम भरा हो सकता है।
ऑटोफैगी कैसे बढ़ाएँ? (Safe Ways)
1. 14–16 घंटे का इंटरमिटेंट फास्टिंग- (8PM–12PM अगले दिन तक)
2. रोज़ हल्का व्यायाम- 30-40 मिनट वॉक, योग, स्ट्रेचिंग।
3. रात को हल्का भोजन- ज्यादा तेल-मसाला, मीठा या ओवरईटिंग न करें।
4. प्रोटीन, सब्जियाँ, हेल्दी फैट बढ़ाएँ- यह शरीर को रिपेयर में मदद करता है।
5. अच्छी नींद- नींद के समय दिमाग की ऑटोफैगी सबसे ज्यादा सक्रिय होती है।
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किसे ऑटोफैगी/फास्टिंग सावधानी से करना चाहिए?
कुछ रोगों में फास्टिंग रखना नुकसानदेह हो सकता है। ऐसे लोग डॉक्टर की सलाह से ही फास्टिंग करें।
- थायराइड
- प्री-डायबिटीज/डायबिटीज
- लो BP
- गैस्ट्रिक अल्सर
- गर्भवती/स्तनपान
- बुज़ुर्ग
- बहुत कम वजन वाले लोग
ऑटोफैगी के दौरान क्या-क्या लिया जा सकता है?
नीचे 3 लेवल दिए हैं- आप कौन-सा फॉलो करना चाहते हैं, यह आपके लक्ष्य पर निर्भर करेगा।
LEVEL 1
सामान्य फास्टिंग (16 घंटे वाला), इस लेवल पर शरीर हल्की–मध्यम ऑटोफैगी करता है। यह इंटरमिटेंट फास्टिंग करने वालों के लिए सबसे आसान और सुरक्षित तरीका है। ऑटोफैगी अच्छी तरह शुरू होती है। इसमें आप ले सकते हैं:
-पानी (Water), ब्लैक कॉफी (बिना शक्कर और दूध), ग्रीन टी / हर्बल टी (बिना शक्कर), नींबू पानी (लेकिन बिना शहद/चीनी), इलेक्ट्रोलाइट्स (बिना कैलोरी वाले), सादा नमक पानी (यदि चक्कर/कमज़ोरी लगे)
LEVEL 2
“क्लीन फास्टिंग” (गहरी ऑटोफैगी चाहने वालों के लिए), इसमें कैलोरी लगभग 0 रखी जाती है ताकि ऑटोफैगी ज़्यादा सक्रिय हो। इसमें नींबू पानी भी कई लोग नहीं लेते, क्योंकि इसमें थोड़ा-सा फ्रुक्टोज़ होता है जो कुछ लोगों में फास्ट तोड़ सकता है। ऑटोफैगी बेहतर हो सकती है। इसमें ले सकते हैं:
-पानी, ब्लैक कॉफी, ब्लैक टी, नमक (पिंच), इलेक्ट्रोलाइट (बिना कैलोरी)
LEVEL 3
“वाटर फास्टिंग” (24 घंटे या अधिक) यह सबसे स्ट्रिक्ट तरीका है। इसमें सिर्फ एक ही चीज़ लेनी चाहिए: सिर्फ पानी, कोई चाय / कॉफी / इलेक्ट्रोलाइट / नींबू नहीं। यह डीप ऑटोफैगी करवा सकता है, लेकिन यह बिना डॉक्टर की सलाह के जोखिम भरा है, विशेषकर: डायबिटीज, BP, थायराइड, गैस्ट्रिक, कमजोर लोग, महिलाएँ आदि के लिए।
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आटोफैगी का रोग निस्तारण में योगदान
आटोफैगी शरीर की क्षतिग्रस्त कोशिकाओं को साफ कर कैंसर, डायबिटीज, हृदय रोगों और न्यूरोडीजेनेरेटिव बीमारियों जैसे अल्जाइमर, पार्किंसन से बचाव में कारगर है। यह विषाक्त प्रोटीन हटाकर इम्यून सिस्टम मजबूत करती है और कोशिकाओं की मरम्मत को बढ़ावा देती है। हालांकि, यह सहायक प्रक्रिया है, पूर्ण इलाज नहीं; डॉक्टर की सलाह जरूरी।
ऑटोफैगी किन रोगों में मददगार हो सकती है
मेटाबोलिक रोग (सबसे प्रभावी): प्री-डायबिटीज, टाइप-2 डायबिटीज, इंसुलिन रेसिस्टेंस, फैटी लिवर, मोटापा। इसमें ऑटोफैगी सबसे ज्यादा कारगर है क्योंकि यह सेल्स को रिपेयर करती है, इंसुलिन को बेहतर करती है और सूजन घटाती है।
सूजन से जुड़े रोग: आर्थराइटिस (हल्के–मध्यम स्तर तक), आंतों की सूजन, क्रॉनिक इंफ्लेमेशन। ऑटोफैगी खराब सूजी हुई कोशिकाएँ साफ करती है, जिससे सूजन कम हो सकती है।
ब्रेन और न्यूरोलॉजिकल रोग: अल्ज़ाइमर, पार्किंसन, ब्रेन फॉग, स्मृति की कमजोरी। दिमाग में जमा प्रोटीन-वेस्ट को हटाने में मदद करती है। विषाक्त पदार्थ हटाकर डिमेंशिया रोकथाम।
Immune-related रोग: ऑटोइम्यून डिज़ीज़ (RA, Lupus) – सीमित लेकिन पॉजिटिव असर, एलर्जी, अस्थमा- हल्का सुधार। इम्यून सिस्टम को शांत करने में मदद करती है। उम्र बढ़ने की प्रक्रिया धीमी। संक्रमण से लड़ाई मजबूत।
कैंसर से जुड़े प्री-कंडीशन्स: सेल्स में DNA damage कम करती है। खराब कोशिकाओं को हटाती है। लेकिन कैंसर होने पर यह इलाज नहीं है- केवल रिसर्च स्तर पर।
क्या ऑटोफैगी से रोग पूरी तरह खत्म हो जाते हैं?
नहीं, ये सच नहीं है – यह डाइजेशन, इम्यून सिस्टम, ब्लड शुगर, लिवर और ब्रेन को बेहतर बनाकर रोगों को धीमा करती है, कंट्रोल करती है, सुधार लाती है, दवाओं की जरूरत कम कर सकती है (डॉक्टर की देखरेख में) लेकिन यह कोई मैजिक क्योर नहीं है।
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निष्कर्ष
ऑटोफैगी एक बहुत ही शानदार और ज़रूरी प्राकृतिक प्रक्रिया है, जो शरीर को अंदर से साफ करके नई ऊर्जा देती है।
सोनाली बेंद्रे ने इसे इसलिए चर्चा में लाया क्योंकि उन्हें अपनी हेल्थ जर्नी में यह समझने से मदद मिली।
लेकिन याद रखें —ऑटोफैगी कोई दवा नहीं है, बल्कि एक हेल्दी लाइफस्टाइल का हिस्सा है। अगर इसे सही तरीके से अपनाया जाए तो यह: वजन, थकान, ऊर्जा, त्वचा, मानसिक स्वास्थ्य सब में सकारात्मक फर्क दिखा सकता है। आटोफैगी कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में सहायता कर सकती है, लेकिन यह केवल एक हिस्सा है, पूरा इलाज डॉक्टर के मार्गदर्शन में ही होना चाहिए।
इस प्रकार, आटोफैगी एक प्राकृतिक, शरीर के अंदर चलने वाली सफाई और मरम्मत प्रक्रिया है, जो हमारी सेहत और जीवनशैली के लिए बहुत जरूरी है, और सोनाली बेंद्रे जैसे बड़े नाम ने इसके फायदों को अपनी बीमारी के समय महसूस किया है।
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https://my.clevelandclinic.org/health/articles/24058-autophagy
